– 51 किसानों को मिला वैज्ञानिक प्रशिक्षण
बाराबंकी। कृषि में बदलाव और आय बढ़ाने की नई राह अब तालाबों से निकलती दिख रही है। मसौली ब्लॉक के ग्राम धानकुट्टी में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की “मखाना विकास परियोजना” के तहत आयोजित एक दिवसीय जागरूकता प्रशिक्षण ने किसानों के सामने कम लागत में ज्यादा मुनाफे का ठोस मॉडल पेश किया। कार्यक्रम का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र-II, कटिया (सीतापुर) ने उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद और प्रवृद्धा फाउंडेशन के समन्वय से किया।
कार्यक्रम की सबसे बड़ी खासियत रही—मछली पालन के साथ मखाना की सह-फसली खेती। प्रगतिशील मत्स्य किसान डॉ. सुरेश शर्मा के फार्म पर हुए इस प्रशिक्षण में बताया गया कि एक ही तालाब से दो तरह की पैदावार लेकर किसान अपनी आय को लगभग दोगुना कर सकते हैं। जलभराव वाली जमीन, जो अब तक बेकार मानी जाती थी, उसे मखाना उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त बताया गया।
कृषि विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक तरीके से मखाना की खेती, बीज चयन, रोपण, रखरखाव और प्रसंस्करण की पूरी प्रक्रिया समझाई। केवीके-II के अध्यक्ष डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव ने किसानों को पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर उद्यमिता अपनाने का आह्वान किया, वहीं वैज्ञानिक डॉ. शुभम सिंह राठौर ने बताया कि सही तकनीक अपनाकर किसान कम समय में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
कार्यक्रम में मखाना के अंतरराष्ट्रीय बाजार और निर्यात क्षमता पर भी फोकस रहा। विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में मखाना की मांग तेजी से बढ़ रही है और विदेशों में इसकी कीमत कई गुना ज्यादा मिलती है। यदि प्रसंस्करण और पैकेजिंग पर ध्यान दिया जाए तो ग्रामीण स्तर पर ही बड़े रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
महिला सशक्तिकरण को भी इस प्रशिक्षण का अहम हिस्सा बनाया गया। महिलाओं को मखाना प्रोसेसिंग, पैकिंग और वैल्यू एडिशन से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और मजबूती दी।प्रमुख रूप से वरिष्ठ पत्रकार राजेश वर्मा सहित तमाम लोगों नें अपने वक्तव्य प्रस्तुत किये।
इस प्रशिक्षण में 51 किसानों और महिलाओं ने भाग लिया और बड़ी संख्या में प्रतिभागियों ने मखाना को एक नए व्यवसाय के रूप में अपनाने में रुचि दिखाई।


