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Thursday, August 20, 2026

हाईकोर्ट में सुनवाई से पहले विधानसभा सचिवालय का बड़ा कदम, प्रभात दुबे की पदोन्नति रद्द

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– वरिष्ठता विवाद पर 20 अगस्त को होनी थी सुनवाई
– एक दिन पहले सचिवालय ने पदोन्नति आदेश में किया संशोधन

लखनऊ।

उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में समीक्षा अधिकारियों की वरिष्ठता और पदोन्नति को लेकर चल रहा विवाद अब नया मोड़ ले चुका है। विधानसभा सचिवालय ने समीक्षा अधिकारी से अनुभाग अधिकारी पद पर प्रभात दुबे को दी गई पदोन्नति को निरस्त कर दिया है। यह निर्णय उस समय सामने आया है, जब पदोन्नति और वरिष्ठता निर्धारण को चुनौती देने वाली याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में 20 अगस्त 2026 को पहली सुनवाई प्रस्तावित थी।
विधानसभा सचिवालय की विज्ञप्ति के जरिए विभिन्न पदों पर पदोन्नति की गई थी। समीक्षा अधिकारी से अनुभाग अधिकारी पद पर पदोन्नति को लेकर कुछ कर्मचारियों ने 17 जून और 14 जुलाई 2026 को प्रत्यावेदन देकर वरिष्ठता निर्धारण पर आपत्ति जताई थी।
सचिवालय के बाद के आदेश में यह तथ्य सामने आया कि संबंधित प्रत्यावेदनों का निस्तारण किए जाने से पहले ही पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी कर दी गई थी। इसी आधार पर पदोन्नति और वरिष्ठता निर्धारण को लेकर न्यायालय में मामला पहुंचा।
मामले में याचिका संख्या ए-8321/2026 दाखिल की गई, जिसमें वरिष्ठता निर्धारण और उसके आधार पर की गई पदोन्नति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिका की पहली सुनवाई 20 अगस्त को निर्धारित थी।
मामले के बीच विधानसभा सचिवालय ने 19 अगस्त 2026 को कार्यालय ज्ञाप संख्या 284/वि०स०/अधि०/16/26 जारी किया। इसके तहत संबंधित कार्मिकों की वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए एक अलग समिति गठित की गई है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर समीक्षा अधिकारियों की अनुभाग अधिकारी पद पर पदोन्नति पर संबंधित नियमों के अनुसार आगे निर्णय लिया जाएगा।
इसके साथ ही सचिवालय ने 1 जुलाई के पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए प्रभात दुबे की अनुभाग अधिकारी पद पर की गई पदोन्नति को निरस्त कर दिया। आदेश में कहा गया है कि वरिष्ठता निर्धारण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू नियमों के अनुरूप पदोन्नति पर विचार किया जाएगा।
हाईकोर्ट में पहली सुनवाई से ठीक एक दिन पहले पदोन्नति निरस्त किए जाने और वरिष्ठता निर्धारण के लिए समिति गठित किए जाने से विधानसभा सचिवालय की पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि, सचिवालय के आदेश में किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ किसी तरह की अनियमितता या आरोप सिद्ध होने की बात नहीं कही गई है।

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