कंपिल। फटक शिला आश्रम में वर्षों तक धर्म, सेवा और मानवता का संदेश देने वाली संत आचार्य नारायण प्रसाद द्विवेदी की वाणी शनिवार को हमेशा के लिए मौन हो गई। रविवार को उनके पंचतत्व में विलीन होने की खबर मिलते ही पहाड़पुर स्थित आश्रम में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। कोई अपने गुरुदेव के चरणों में पुष्प अर्पित कर रहा था तो कोई नम आंखों से अंतिम दर्शन कर उन्हें विदाई दे रहा था। पूरे वातावरण में वेद मंत्रों के साथ “गुरुदेव अमर रहें” के जयघोष गूंजते रहे।
आश्रम के संस्थापक आचार्य नारायण प्रसाद द्विवेदी पिछले कुछ समय से कैंसर से पीड़ित थे। उनका उपचार लखनऊ के सनराइज अस्पताल में चल रहा था, जहां शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। रविवार दोपहर उनका पार्थिव शरीर फटक शिला आश्रम पहुंचा तो अंतिम दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में शिष्य, संत-महात्मा और श्रद्धालु आश्रम पहुंचे। वेद मंत्रों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार आश्रम परिसर में उन्हें समाधि दी गई। अंतिम यात्रा में संत समाज, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और हजारों श्रद्धालुओं ने नम आंखों से अपने पूज्य गुरुदेव को अंतिम विदाई दी। आश्रम परिसर भजन-कीर्तन और श्रद्धांजलि के स्वरों से गूंजता रहा।
शिष्य रवि सिंह ने कहा कि गुरुदेव का संपूर्ण जीवन सेवा, त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक साधना को समर्पित रहा। उन्होंने हजारों लोगों को धर्म, संस्कार और मानव सेवा का मार्ग दिखाया। उनके निधन से आध्यात्मिक जगत ने एक ऐसे संत को खो दिया, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
सेवानिवृत्त आईएएस अवधेश सिंह ने कहा कि आचार्य नारायण प्रसाद द्विवेदी जैसे सरल, सहज और तपस्वी संत विरले ही होते हैं। वहीं शिवमंगल सिंह ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि गुरुदेव का स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन सदैव श्रद्धालुओं के जीवन में प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
उनके निधन की सूचना मिलते ही पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं और हर कोई यही कह रहा था कि गुरुदेव का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन उनके विचार, संस्कार और आध्यात्मिक विरासत हमेशा लोगों के हृदय में जीवित रहेंगे।


