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Saturday, February 28, 2026

जाँच एजेंसियों का निष्पक्ष होना आवश्यक

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(डाॅ. चन्दर सोनाने-विनायक फीचर्स)

दिल्ली की विशेष सीबीआई कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और सभी अन्य आरोपियों को आरोप तय होने से पहले ही आरोप मुक्त कर दिया। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार की आबकारी नीति में सीबीआई ने केजरीवाल को 176 और सिसोदिया को 530 दिन जेल में रखा था। जिस केस में ये जेल में रहे, उसे कोर्ट ने आरोप तय करने के लायक भी नहीं माना !

सीबीआई की विशेष कोर्ट के जस्टिस जितेन्द्र सिंह ने इस संबंध में कहा कि लोक सेवक को बिना सबूत के आरोपी बना दिया गया है। जाँच अधिकारी की जाँच की जाए। कोर्ट ने कहा कानूनी तौर पर ऐसी कोई सामग्री नहीं है, जिससे गंभीर संदेह बनता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना स्वीकार्य सबूतों के आरोपियों को आपराधिक मुकदमे में घसीटना न्याय का दूरूपयोग और आपराधिक प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा।

सीबीआई की विशेष कोर्ट का उक्त निर्णय यह बताता है कि सीबीआई हो या अन्य कोई जाँच एजेंसी, उनका निष्पक्ष होना प्रजातंत्र के लिए जरूरी है ! सामान्यतः सत्ता में बैठे लोग विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने में और उसे बदनाम करने में इन जाँच एजेंसियों का दुरूपयोग करते आ रहे है।

देश में सरकार किसी की भी हो, वे विपक्षी दलों की सरकारों को बदनाम करने में जाँच एजेंसियों का उपयोग करती आ रही है। इसका लंबा इतिहास है। जब देश में श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार थी, तब उन्होंने भी सीबीआई सहित सभी जाँच एजेंसियों का जमकर दुरूपयोग किया। वर्तमान की भाजपा सरकार भी इस मामले में कांग्रेस से अलग नहीं है, बल्कि उससे चार कदम आगे ही है !

राज्य हो या केन्द्र, किसी भी सरकार के लिए सक्षम विपक्ष प्रजातंत्र के लिए जरूरी है। विपक्ष यदि सक्षम होगा तो वह सरकार पर नकेल डाल सकेगा और सरकारें गलत फैसले लेने से बचती रहेगी। किन्तु अब ऐसा हो नहीं रहा है। यह प्रजातंत्र के लिए खतरा है।

दिल्ली की शराबनीति से जुड़े मामले में लंबी जाँच, गिरफ्तारियां और राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप के बाद जब अदालतें कई आरोपियों को राहत देती है या सबूतों की कमजोरी पर सवाल उठाती है, तो बहस केवल एक केस तक सीमित नहीं होती। यह बहस उस बड़े सवाल में बदल जाती है कि क्या भारत की राजनीति में आरोप ही सजा बनते जा रहे हैं ! दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया जैसे नेताओं पर कार्रवाई, जेल और हाल ही में न्यायिक राहत, इस पूरे क्रम ने एक बार फिर यह यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जाँच एजेंसियों, न्यायिक प्रक्रिया और राजनैतिक नैरेटिव के बीच संतुलन कहाँ है ?

अन्ततः यह बहस किसी एक पार्टी की जीत या हार की नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक संतुलन की बहस है, जिसमें एजेंसियाँ स्वतंत्र रहे, राजनीति जवाबदेह रहे और न्यायिक प्रक्रिया समयबद्ध हो। आरोप जरूरी हो सकते हैं, पर लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि अंतिम सत्य आरोप नहीं, बल्कि प्रमाण और न्यायिक निष्कर्ष तय करें।

देश के प्रजातंत्र में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। समय साक्षी है। सबका हिसाब-किताब होता है। देश के प्रजातंत्र के हित में यह जरूरी है कि देश की सभी जाँच एजेंसियां निष्पक्ष हो और अपने दायरे में रहकर कार्य करें, तभी प्रजातंत्र जिंदा रह सकेगा।

(विनायक फीचर्स)

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