(डॉ. सुधाकर आशावादी-विभूति फीचर्स)
आज देश जिस मुहाने पर खड़ा है, वहां स्वाधीन भारत में लोकतंत्र की समीक्षा किया जाना अनिवार्य प्रतीत होता है, क्योंकि कतिपय राजनीतिक दलों के नायकों ने आम नागरिक को मूल मुद्दों से भटकाकर ऐसा वातावरण तैयार कर दिया गया है, कि आम आदमी राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को भूलकर स्वार्थ जनित अधिकारों के प्रति आंदोलन रत है। उसे न तो स्वरोज़गार से कोई सरोकार है और न ही असमान सरकारी सुविधाओं के आवंटन से । वस्तुस्थिति यह है कि आम नागरिकों के प्रतिनिधियों ने लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन को मछली बाज़ार सरीखा बना दिया है, जहां मुद्दों पर कोई बहस नही होती, बल्कि संसद परिसर में बेहूदे और अपमान जनक विषयों पर नुक्कड़ नाटकों का फूहड़ प्रदर्शन किया जाता है। सनातन आस्थाओं का मजाक उड़ाया जाता है।
लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार सभी को भेदभाव रहित सुविधाएँ, समान न्याय मिलना चाहिए। समान नागरिक संहिता का अनुपालन किया जाना चाहिए। धर्मगत और जातिगत भेदभाव पर आधारित व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, किंतु ऐसा नहीं है। संकीर्ण राजनीतिक सोच के चलते देश के युवाओं को भ्रमित किया जा रहा है। शिक्षा सुधार के नाम पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले छात्रों को सत्ता विरोध के लिए उकसा कर विशुद्ध राजनीति करने से परहेज़ नहीं किया जा रहा है। लोकतांत्रिक कल्याणकारी योजनाओं में धन का बँटवारा भी आम आदमी की समान रूप से वितरित न करके विशिष्ट श्रेणी तक सीमित रखना लोकतंत्र के कौन से मूल सिद्धांत का प्रतीक है, यह समझ से परे है। ऐसे में मुद्दे अनेक हैं, जो स्वाधीन भारत में लोकतंत्र की स्थिति की समीक्षा करने हेतु विवश करते हैं। सो स्वाधीनता दिवस पर व्यापक चिंतन अपेक्षित है कि पंद्रह अगस्त 1947 से पंद्रह अगस्त 2026 तक के उन्यासी बरसों में देश लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का कितना लोकतांत्रिक तरीक़े से प्रबंधन कर पाया है ? क्या देश लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के अनुपालन की कसौटी पर खरा उतर रहा है ? यदि नहीं तो ऐसे कौन से उपाय किए जाएँ तथा कौन से कठोर कदम उठाए जाएँ, जिनसे देश में स्वस्थ लोकतंत्र की अनुभूति हो सके। *(विभूति फीचर्स)*


