– जानलेवा हमले की एफआईआर रद्द करने से इंकार
प्रयागराज। गंभीर आपराधिक मामलों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि खून-खराबे वाले मामलों में आपसी समझौता कानून से बचने का रास्ता नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में समझौता “रफा-दफा करने का लाइसेंस” नहीं है।
यह अहम टिप्पणी मेरठ निवासी मनोज के मामले में सामने आई, जहां जानलेवा हमले की दर्ज एफआईआर को समझौते के आधार पर रद्द कराने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया।
मामले के अनुसार, वर्ष 2025 में दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था, जिसमें गंभीर हिंसा और जानलेवा हमले के आरोप लगे। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता होने का हवाला देकर एफआईआर रद्द करने की अर्जी दाखिल की गई थी।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि ऐसे अपराध केवल दो व्यक्तियों के बीच का निजी विवाद नहीं होते, बल्कि समाज के खिलाफ अपराध होते हैं, इसलिए इन्हें समझौते के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
इस फैसले से साफ संदेश गया है कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर मामलों में आरोपी केवल समझौता दिखाकर कानूनी कार्रवाई से नहीं बच सकते। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि कानून का उद्देश्य समाज में न्याय और सुरक्षा बनाए रखना है, न कि गंभीर अपराधों को निजी समझौते से खत्म करना।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला कानून व्यवस्था के लिए अहम मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे स्पष्ट हो गया है कि अब गंभीर अपराधों में “सेटिंग” या समझौते का खेल नहीं चलेगा। यह निर्णय न्याय प्रणाली को और सख्त व जवाबदेह बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
“खूनी मामलों में समझौता नहीं चलेगा”, हाईकोर्ट


