लखनऊ। विकास नगर अग्निकांड ने अब सिर्फ एक हादसे की सीमा पार कर प्रशासनिक लापरवाही और अवैध कब्जों के बड़े खेल को उजागर कर दिया है। मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सीधे प्रशासनिक अफसरों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि आखिर कैसे वर्षों तक लोक निर्माण विभाग की जमीन पर अतिक्रमण होता रहा और जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे रहे? कोर्ट ने इस पूरे प्रकरण में गहराई से जांच के आदेश दिए हैं और संबंधित पक्षकार अफसरों से 13 मई तक जवाब तलब किया है।
सबसे अहम बात यह है कि जिला प्रशासन और नगर निगम दोनों को अलग-अलग हलफनामे दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं। जिलाधिकारी और नगर आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से जवाब देना होगा कि आखिर उनके कार्यकाल में यह अवैध कब्जे कैसे फलते-फूलते रहे।
सूत्र बताते हैं कि विकास नगर क्षेत्र में वर्षों से लोक निर्माण विभाग की जमीन पर दुकानों, गोदामों और अस्थायी निर्माण का जाल फैला हुआ था। अग्निकांड के बाद सामने आया कि ये अवैध निर्माण न सिर्फ सुरक्षा मानकों का उल्लंघन कर रहे थे, बल्कि आपातकालीन सेवाओं के लिए भी बाधा बने। यही वजह रही कि आग बुझाने में भारी दिक्कतें आईं और नुकसान कई गुना बढ़ गया।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोर्ट इस मामले में सख्त रुख बनाए रखता है तो यह प्रदेश भर में अतिक्रमण के खिलाफ एक बड़ा उदाहरण बन सकता है। वहीं, स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण संभव ही नहीं है—जिससे भ्रष्टाचार की बू भी साफ महसूस हो रही है।
प्रारंभिक आंकड़ों के मुताबिक, इस अग्निकांड में करोड़ों रुपये की संपत्ति जलकर खाक हो गई, जबकि दर्जनों परिवारों की आजीविका पर सीधा असर पड़ा है।
लखनऊ विकास नगर अग्निकांड: हाईकोर्ट का सख्त रुख


