फर्रुखाबाद। मोहर्रम की दूसरी तारीख पर बृहस्पतिवार को शहर में अकीदत और गम का माहौल देखने को मिला। मोहल्ला बूरा वाली गली स्थित फिदा हैदर इमामबाड़े में आयोजित मजलिस में बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत कर हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानियों को याद किया। मजलिस के दौरान मातम का दौर चला और कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश की गई।
मजलिस को संबोधित करते हुए शिया धर्मगुरु मौलाना सैयद सदाकत हुसैन सैंथली ने कहा कि मोहर्रम का महीना इस्लामी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक घटनाओं की याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि यह महीना केवल गम मनाने का नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, त्याग और इंसानियत के मूल्यों को आत्मसात करने का भी संदेश देता है।
मौलाना ने कहा कि मोहर्रम की दूसरी मजलिस में विशेष रूप से हजरत फातिमा ज़हरा की याद ताज़ा की गई। उन्होंने हजरत फातिमा के जीवन, उनके चरित्र और इस्लाम के प्रति उनके योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन महिलाओं के लिए आदर्श और पूरी इंसानियत के लिए प्रेरणास्रोत है।
उन्होंने अपनी तकरीर में बताया कि मोहर्रम की पहली तारीख मुसलमानों के दूसरे खलीफा अमीरुल मोमिनीन हजरत उमर फारूक की शहादत की याद भी दिलाती है। वहीं इसी महीने में कर्बला की वह दर्दनाक घटना हुई, जब यज़ीद की हुकूमत के खिलाफ सत्य और न्याय की लड़ाई लड़ते हुए पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन तथा उनके 72 साथियों ने शहादत स्वीकार की, लेकिन अत्याचार के आगे सिर नहीं झुकाया।
मौलाना ने कहा कि माह-ए-मोहर्रम शुरू होते ही इमामबाड़ों, मस्जिदों और घरों में मजलिसों तथा महफिलों का सिलसिला शुरू हो जाता है। इन आयोजनों के माध्यम से कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों को याद किया जाता है और नई पीढ़ी को उनके आदर्शों से परिचित कराया जाता है।
मजलिस के समापन पर अकीदतमंदों ने मातम कर कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा अमन, भाईचारे और इंसानियत की सलामती के लिए दुआ मांगी।
इस अवसर पर नाजिर हुसैन, राजा भाई, जावेद हैदर, शादाब जैदी, शानू, शबाब, मुन्ना सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।
मोहर्रम की दूसरी मजलिस में हजरत फातिमा को किया गया याद, गूंजा मातम और इंसानियत का पैगाम


