लखनऊ। एक समय लखनऊ की पहचान माने जाने वाले पारंपरिक रिक्शे आज अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। भीषण गर्मी, घटती सवारियां और ई-रिक्शा व अन्य आधुनिक वाहनों के बढ़ते चलन ने रिक्शा चालकों की रोजी-रोटी पर गहरा असर डाला है। शहर के कई प्रमुख चौराहों और बाजारों में रिक्शा चालक घंटों तेज धूप में खड़े रहने के बावजूद सवारी का इंतजार करते नजर आ रहे हैं।
रिक्शा चालकों का कहना है कि पहले दिनभर में पर्याप्त सवारियां मिल जाती थीं, जिससे परिवार का खर्च आसानी से चल जाता था। लेकिन अब स्थिति लगातार बिगड़ रही है। शहर में ई-रिक्शा, ऑटो और ऐप आधारित परिवहन सेवाओं के विस्तार के कारण पारंपरिक रिक्शों की मांग तेजी से कम हुई है।
चालकों के अनुसार भीषण गर्मी ने भी उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। दोपहर के समय लोग कम निकल रहे हैं, जबकि जो यात्री यात्रा करते हैं वे अधिकतर ई-रिक्शा या अन्य तेज साधनों को प्राथमिकता देते हैं। इससे रिक्शा चालकों की दैनिक आय में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
कई रिक्शा चालकों ने बताया कि पहले जहां दिनभर में 400 से 500 रुपये तक की कमाई हो जाती थी, वहीं अब कई बार 150 से 200 रुपये जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। बढ़ती महंगाई के बीच परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और घर का पालन-पोषण करना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
सामाजिक जानकारों का मानना है कि पारंपरिक रिक्शे केवल एक परिवहन साधन नहीं, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। चौक, अमीनाबाद, हजरतगंज और पुराने शहर की गलियों में कभी रिक्शों की अलग ही रौनक दिखाई देती थी। लेकिन तकनीक और आधुनिक परिवहन व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव के बीच यह विरासत धीरे-धीरे पीछे छूटती नजर आ रही है।
रिक्शा चालकों का कहना है कि यदि उनके लिए कोई विशेष सहायता योजना, आर्थिक सहयोग या वैकल्पिक रोजगार प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले समय में बड़ी संख्या में लोगों को यह पेशा छोड़ना पड़ सकता है। बदलते समय के साथ लखनऊ की सड़कों से पारंपरिक रिक्शों की पहचान धुंधली होती जा रही है, जो शहर की सांस्कृतिक विरासत के लिए भी चिंता का विषय है।


