डॉ दीपक द्विवेदी
“जिसने तुम्हें धोखा दिया, जिसने तुम्हारा इस्तेमाल किया या तुम्हारा हक मारा, उसे माफ कर दो और आगे बढ़ जाओ।” यह वाक्य सुनने में जितना सरल और आध्यात्मिक लगता है, जीवन के वास्तविक अनुभवों में उतना ही जटिल है। क्योंकि क्षमा और अन्याय को स्वीकार कर लेना,दोनों एक बात नहीं हैं।
क्षमा का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने साथ हुए अन्याय को भूल जाए, अपराध को सही मान ले या अपने अधिकारों से समझौता कर ले। कई बार किसी को माफ करना अपने मन को उस घटना के बोझ से मुक्त करने का तरीका हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना छोड़ दिया जाए।
समाज में “क्षमा वीरों का आभूषण है” जैसी बातें लंबे समय से कही जाती रही हैं। लेकिन क्षमा तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा से आए। डर, दबाव या असहायता में चुप रहना क्षमा नहीं कहा जा सकता।
यदि किसी ने आपका आर्थिक, सामाजिक या व्यक्तिगत अधिकार छीना है, तो उसके लिए उचित कानूनी और सामाजिक रास्ते अपनाना भी जरूरी है। अपने अधिकार की रक्षा करना प्रतिशोध नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का हिस्सा हो सकता है।
किसी के व्यवहार से चोट लगने के बाद मन में गुस्सा, दुख और निराशा पैदा होना स्वाभाविक है। समस्या तब पैदा होती है जब व्यक्ति इन भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें लगातार दबाता रहे। ऐसे में व्यक्ति मानसिक रूप से परेशान महसूस कर सकता है।
इसलिए जरूरी है कि चोट को स्वीकार किया जाए, उससे सीख ली जाए और भविष्य में वही स्थिति दोबारा न बनने देने के लिए सीमाएं तय की जाएं।
भारतीय दर्शन में कर्म की अवधारणा महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे व्यक्तिगत बदले या हिंसा का लाइसेंस समझना उचित नहीं है। गीता का संदेश भी केवल प्रतिशोध तक सीमित नहीं है। उसमें कर्तव्य, विवेक, आत्मसंयम और धर्मसम्मत कर्म पर जोर मिलता है।
महाभारत का संदर्भ हमें यह सोचने का अवसर देता है कि अन्याय के सामने खड़े होने और व्यक्तिगत बदले की भावना में अंतर है।
जिस व्यक्ति ने धोखा दिया, उससे दूरी बनाना जरूरी हो सकता है। जिसने अधिकार छीना, उसके खिलाफ आवाज उठाना जरूरी हो सकता है। लेकिन अपने जीवन का केंद्र उसी व्यक्ति को बना देना भी उचित नहीं।
सबसे बड़ी जीत शायद यह है कि जिसने आपको चोट पहुंचाई, वह आपके भविष्य का मालिक न बन सके।क्षमा करनी है तो अपने मन की शांति के लिए करें, मजबूरी में नहीं।न्याय चाहिए तो उसके लिए आवाज उठाएं, लेकिन बदले की आग में अपना जीवन न जलाएं।
अपना हक छोड़ना महानता नहीं,और हर लड़ाई लड़ना भी शक्ति नहीं। असली शक्ति है यह तय करना कि कहां क्षमा करनी है, कहां सीमा खींचनी है और कहां अपने अधिकार के लिए दृढ़ता से खड़ा होना है।
लेखक अधिवक्ता हैं।


