विकास, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विश्वसनीयता के संकट में घिरा जनपद, जनता बोली – “अब अति पिछड़ा जिला घोषित कर दो फर्रुखाबाद”
शरद कटियार
लखनऊ /फर्रुखाबाद। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हुए ताजा मंत्रिमंडल विस्तार ने एक बार फिर फर्रुखाबाद की राजनीतिक हैसियत पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कभी सत्ता के केंद्रों तक मजबूत पकड़ रखने वाला जनपद आज प्रतिनिधित्व, विकास और प्रशासनिक इच्छाशक्ति तीनों मोर्चों पर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जिले में मंत्री पद की उम्मीद लगाए बैठे समर्थकों और आम जनमानस को जब सूची में फर्रुखाबाद का नाम नहीं मिला तो लोगों ने इसे “जनपद की राजनीतिक उपेक्षा” करार दिया।
शहर से लेकर गांव तक चर्चा यही रही कि आखिर चार विधानसभाओं वाले जिले, भाजपा के विधायकों और लंबे राजनीतिक इतिहास के बावजूद फर्रुखाबाद लगातार हाशिए पर क्यों धकेला जा रहा है? आम लोगों के बीच यह तक कहा जाने लगा कि “अब सरकार फर्रुखाबाद को अति पिछड़ा जिला घोषित कर दे”, क्योंकि विकास योजनाओं, उद्योग, स्वास्थ्य, सड़क और राजनीतिक प्रतिनिधित्व – हर मोर्चे पर जिला लगातार पिछड़ता जा रहा है।
जनता के बीच सबसे अधिक नाराजगी जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली को लेकर दिखाई दे रही है। लोगों का आरोप है कि कई नेता जनता को मिलने तक का समय नहीं देते और जो कभी-कभार सुनवाई करते भी हैं, उनके अधीनस्थ अधिकारी आम आदमी की फाइलों को महीनों दबाकर बैठ जाते हैं। परिणाम यह कि तहसील से लेकर जिला मुख्यालय तक बिना “सिस्टम” के कोई काम आगे नहीं बढ़ता।
गहन राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि जनपद में वर्षों से सत्ता बदलती रही, लेकिन “सिस्टम” नहीं बदला। समाजवादी पार्टी शासनकाल में मलाई काटने वाले कथित ज़मीन कारोबारी, दागी तत्व और रसूखदार ठेकेदार सत्ता परिवर्तन के बाद भी प्रभावशाली बने रहे। आरोप यह भी लगते रहे कि जिन लोगों ने पिछली सरकारों में अवैध कमाई की, वही चेहरे नई व्यवस्था में भी संरक्षण पाकर सरकारी ठेकों और नेटवर्क पर हावी रहे। इससे जीरो टॉलरेंस की नीति की साख को स्थानीय स्तर पर भारी नुकसान पहुंचा।
फर्रुखाबाद में जिला पंचायत जैसी संस्थाओं में कमीशनखोरी का प्रतिशत पहले से अधिक बढ़ने की चर्चा भी प्रशासनिक गलियारों में खुलकर होने लगी है। इसका सीधा असर विकास कार्यों की गुणवत्ता पर दिखाई दिया। सबसे बड़ा उदाहरण इटावा-बरेली हाईवे को लेकर दिया जा रहा है। लोगों का आरोप है कि फर्रुखाबाद सीमा में बनने वाला हाईवे बड़े पैमाने पर मानक विहीन निर्माण का शिकार हुआ, लेकिन जनप्रतिनिधियों से लेकर जिम्मेदार विभागों तक किसी ने प्रभावी आवाज नहीं उठाई। सड़क की गुणवत्ता, जल निकासी और निर्माण सामग्री को लेकर लगातार सवाल उठते रहे, मगर कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं होती रहीं।
जनपद की पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती। बहुचर्चित गंगा एक्सप्रेसवे का रूट फर्रुखाबाद से न गुजरना आज भी राजनीतिक चर्चा और जनाक्रोश का बड़ा विषय बना हुआ है। व्यापारियों, युवाओं और किसानों का मानना है कि यदि एक्सप्रेसवे जनपद से जुड़ता तो उद्योग, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होते। लेकिन राजनीतिक कमजोरी और प्रभावहीन पैरवी के चलते फर्रुखाबाद यह बड़ा अवसर खो बैठा।
संकिसा से जुड़ी परियोजना का दूसरे जिलों की ओर खिसकना भी लोगों की नाराजगी का कारण बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सर्किट में महत्वपूर्ण पहचान रखने वाले संकिसा को लेकर वर्षों से बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत में कई परियोजनाएं पड़ोसी जिलों की ओर शिफ्ट होती चली गईं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सही पैरवी होती तो पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में फर्रुखाबाद की तस्वीर बदल सकती थी।
गंगा को निर्मल बनाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए जा रहे वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट का वर्षों तक अधूरा पड़े रहना भी जनपद की प्रशासनिक विफलता का बड़ा प्रतीक माना जा रहा है। जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर करोड़ों की परियोजना आज तक पूरी क्यों नहीं हुई? यदि हुई तो उसका लाभ धरातल पर क्यों नहीं दिखाई देता? सबसे हैरानी की बात यह बताई जा रही है कि इतने बड़े मुद्दे पर भी जिले की राजनीति लगभग मौन बनी रही।
सूत्रों की मानें तो जब प्रदेश सरकार ने जीरो टॉलरेंस नीति के तहत माफिया तंत्र पर शिकंजा कसना शुरू किया, तब फर्रुखाबाद के कुछ प्रभावशाली नेताओं ने खुलकर कथित माफिया तत्वों के समर्थन में मोर्चा संभाल लिया। यहां तक कि प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ शासन तक पत्राचार किए जाने की चर्चाएं भी राजनीतिक हलकों में गर्म रहीं। माना जाता है कि ऐसे फीडबैक ने भी शासन स्तर पर जिले की छवि को नुकसान पहुंचाया।
सबसे गंभीर आरोप स्थानीय पत्रकारों और कलमकारों के उत्पीड़न को लेकर लगाए जा रहे हैं। जनमानस की आवाज सरकार तक पहुंचाने वाले कई पत्रकारों ने वर्षों तक दबाव, मुकदमों और प्रशासनिक प्रताड़ना का सामना किया। आरोप हैं कि झूठे मुकदमे लिखवाए गए, सुरक्षा हटवाई गई और उन्हें मुख्यमंत्री तक पहुंचने से रोकने के लिए व्यवस्थित षड्यंत्र रचे गए, ताकि जिले की वास्तविक तस्वीर सत्ता के शीर्ष तक न पहुंच सके। बावजूद इसके, फर्रुखाबाद की जमीनी सच्चाइयां धीरे-धीरे शासन तक पहुंचती रहीं और अब मंत्रिमंडल विस्तार में जिले की उपेक्षा को उसी फीडबैक का परिणाम माना जा रहा है।
आज फर्रुखाबाद में सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है , आखिर जनपद की राजनीतिक ताकत लगातार कमजोर क्यों होती गई? क्या कारण है कि विकास योजनाएं छिनती रहीं, उद्योग नहीं आए, सड़कें सवालों में रहीं, पर्यटन ठप पड़ा और मंत्री पद तक नसीब नहीं हुआ? जनता अब जवाब चाहती है। क्योंकि फर्रुखाबाद केवल एक जिला नहीं, बल्कि राजनीतिक उपेक्षा की उस कहानी का नाम बनता जा रहा है जहां उम्मीदें हर बार सत्ता के दरवाजे पर जाकर दम तोड़ देती हैं।


