कमालगंज: ना धूप-बारिश से बचने को शेड, ना बैठने को जगह; बाढ़ में गौरी शंकर घाट पर अफरा-तफरी, जनमानस ने प्रशासन से लगाई गुहार
श्रृंगीरामपुर, फर्रुखाबाद। मोक्षदायिनी गंगा के पावन तट पर बसे प्राचीन तीर्थ स्थल श्रृंगीरामपुर का गंगा घाट आस्था का केंद्र तो है, पर यहां जीवन की अंतिम यात्रा की व्यवस्थाएं दशकों से उपेक्षा का शिकार हैं। गंगा जी के मुख्य घाट पर बना एकमात्र शवदाह गृह अब पूरी तरह जर्जर और बदहाल अवस्था में पहुंच चुका है। ना वहां साफ-सफाई है, ना कोई बुनियादी सुविधा और ना ही प्रशासन का कोई इंतजाम दिखाई देता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह शवदाह गृह दशकों पूर्व बनाया गया था। आज उसकी दीवारें जगह-जगह से टूटी हैं, ऊपर पड़ा टीन शेड उखड़ कर बिखर चुका है। बरसात में तो स्थिति दयनीय हो जाती है। जब गंगा जी में बाढ़ आती है तो मुख्य घाट जलमग्न हो जाता है, तब मजबूरी में लोगों को गौरी शंकर घाट पर अंतिम संस्कार करना पड़ता है।
गौरी शंकर घाट पर बदइंतजामी का आलम यह हैं कि टीले पर बना एकमात्र प्रतीक्षालय और एक टूटा-फूटा शवदाह गृह ही सहारा है। उसका भी टीन शेड टूटा हुआ है। बारिश के दौरान ऊपर से कोई सुरक्षा नहीं होने के कारण जलती चिताएं भीग जाती हैं, एकमात्र प्रतीक्षालय जिसमें भीड़ ज्यादा होने पर लोगों को खुले आसमान के नीचे धूप और बारिश में खड़े होकर अंतिम संस्कार की पीड़ा झेलनी पड़ती है।
श्रृंगीरामपुर तीर्थ स्थल का महत्व केवल स्थानीय नहीं है। आसपास के जिलों से लोग अपने परिजनों की अंत्येष्टि के लिए यहां के पावन घाट पर आते हैं। कई बार एक साथ दो-चार शव आ जाने पर जगह की भारी कमी हो जाती है। गंगा का पानी घाट के ऊपर तक आ जाने से अफरा-तफरी की स्थिति बन जाती है जो मानवता को झकझोर देने वाला दृश्य होता है।
श्रृंगी रामपुर घाट की उपेक्षा का सबसे बड़ा उदाहरण इसी जिले में मौजूद है। फर्रुखाबाद का घटियाघाट, जिसे पांचाल घाट के नाम से जाना जाता है, वहां शवदाह के लिए पक्के प्लेटफार्म, बैठने के लिए पार्क, छायादार पेड़, स्वच्छ प्रतीक्षालय और पर्याप्त शेड की व्यवस्था की गई है। इसके उलट श्रृंगी ऋषि की तपोभूमि श्रृंगीरामपुर जैसे प्रसिद्ध तीर्थ स्थल पर सुविधाएं न के बराबर हैं, जो हैं भी वह पूरी तरह बेकार हो चुकी हैं।
यह सवाल जनमानस के मन में है कि जब एक ही जिले में एक घाट को संवारा जा सकता है तो दूसरे पवित्र घाट को क्यों भुला दिया गया?
क्षेत्र के लोगों और तीर्थ पुरोहितों ने प्रशासन से मांग की है कि इस मानवीय और धार्मिक महत्व के विषय पर तुरंत ध्यान दिया जाए।
एक व्यक्ति जब अपनों को खोता है तो वह पहले से ही दुख में होता है। ऐसे में अंतिम संस्कार स्थल पर अव्यवस्था उसकी पीड़ा को और बढ़ा देती है। प्रशासन को चाहिए कि वह इस तीर्थ की गरिमा और जनभावनाओं को समझते हुए जल्द से जल्द ठोस कदम उठाए, ताकि मोक्ष की इस भूमि पर किसी की अंतिम यात्रा अपमान और अव्यवस्था का शिकार न हो।


