प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी एक ही घटना या मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) को एक साथ लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि दोनों धाराओं की प्रकृति और कानूनी आधार अलग-अलग हैं, इसलिए एक ही तथ्य और परिस्थितियों पर आधारित मामले में दोनों अपराधों को साथ जोड़ना कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मेरठ के सिविल लाइंस थाने में दर्ज राज्य बनाम अभिषेक गौतम मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने मामले में संज्ञान लेने की कार्रवाई और आरोपी के खिलाफ जारी समन को भी निरस्त कर दिया। फैसले में कहा गया कि यदि किसी व्यक्ति पर शुरू से ही धोखा देकर संपत्ति या लाभ प्राप्त करने का आरोप है तो मामला धोखाधड़ी का हो सकता है, जबकि किसी को भरोसे के आधार पर सौंपी गई संपत्ति का बाद में दुरुपयोग करना आपराधिक विश्वासघात की श्रेणी में आता है।
अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित दिल्ली रेस क्लब मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के अपराध में शुरुआत से ही आपराधिक मंशा का होना आवश्यक है, जबकि आपराधिक विश्वासघात में संपत्ति का वैध रूप से सौंपा जाना और बाद में उसका बेईमानी से उपयोग किया जाना मुख्य तत्व होता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम और अधिवक्ता अतिप्रिया गौतम ने अदालत में दलील दी कि एफआईआर में लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से गलत और मनगढ़ंत हैं तथा उनका वास्तविक घटनाक्रम से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने इन तर्कों पर विचार करने के बाद माना कि मामले में लगाए गए आरोपों और धाराओं के बीच कानूनी सामंजस्य नहीं है।


