शरद कटियार
लोकतंत्र की खूबसूरती असहमति में है। सरकार से लेकर न्यायपालिका, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं तक,किसी भी व्यवस्था में सवाल पूछने और अपनी बात रखने का अधिकार लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी ताकत है। लेकिन असहमति और संस्थागत अवमानना के बीच की महीन रेखा जब धुंधली होने लगती है, तब लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी होती है।
नाल्सार विधि विश्वविद्यालय के 2026 बैच के कानून स्नातकों के पंजीकरण पर बार काउंसिल की रोक ने इसी व्यापक सवाल को फिर सामने ला दिया है। मामला केवल एक विश्वविद्यालय या कुछ विद्यार्थियों के विरोध तक सीमित नहीं है। असली प्रश्न यह है कि कानून के विद्यार्थी, विश्वविद्यालय प्रशासन और पेशेवर संस्थाएं असहमति के अधिकार तथा संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के बीच संतुलन कैसे कायम करें।
विश्वविद्यालय विचारों की प्रयोगशाला होते हैं। वहां प्रश्न उठना चाहिए, बहस होनी चाहिए और असहमति के स्वर भी सुनाई देने चाहिए। किसी विद्यार्थी को केवल इसलिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि उसने किसी निर्णय या कार्यक्रम से असहमति जताई। लेकिन यदि विरोध किसी संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने, व्यक्तिगत अपमान या किसी संगठित अभियान के रूप में सामने आता है, तो तथ्यों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है।
बार काउंसिल का कठोर रुख इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। अधिवक्ता केवल कानून की जानकारी रखने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग होता है। इसलिए कानून के विद्यार्थियों और भविष्य के अधिवक्ताओं से संस्थागत मर्यादा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा स्वाभाविक है।
फिर भी एक सवाल अपनी जगह कायम है,यदि कुछ लोगों की भूमिका संदिग्ध है तो पूरे बैच के विद्यार्थियों का पंजीकरण रोकना कितना उचित है? जांच पूरी होने से पहले सामूहिक कार्रवाई से उन विद्यार्थियों को नुकसान पहुंच सकता है, जिनका कथित अभियान से कोई लेना-देना ही नहीं था। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि दोष व्यक्तिगत हो तो जिम्मेदारी भी व्यक्तिगत ही तय की जाए।
यह प्रकरण विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े करता है। किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान में विचारों की स्वतंत्रता और अनुशासन दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। प्रशासन को न तो विद्यार्थियों की वैध असहमति से डरना चाहिए और न ही किसी ऐसे अभियान को अनदेखा करना चाहिए जो संस्थागत मर्यादा या कानून की सीमा पार करता हो।
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी विचार या विरोध का प्रसार कुछ घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। ऐसे वातावरण में किसी अभियान की वास्तविक प्रकृति,स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया, छात्र असहमति या सुनियोजित अभियान—का निर्धारण तथ्यों के आधार पर ही किया जा सकता है। केवल सोशल मीडिया पोस्ट या सार्वजनिक आरोप किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं होने चाहिए।
इस पूरे विवाद से एक बड़ा सबक यह भी निकलता है कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा की रक्षा केवल आदेशों और दंड से नहीं, बल्कि नागरिकों में संवैधानिक संस्कार विकसित करने से होती है। विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को यह समझाना होगा कि विरोध करना उनका अधिकार है, लेकिन विरोध का तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए।
बार काउंसिल को भी अपने निर्णय में यही संतुलन कायम करना होगा। कठोरता आवश्यक हो सकती है, लेकिन कठोरता का अर्थ सामूहिक दंड नहीं होना चाहिए। जांच पारदर्शी हो, दोषियों की पहचान प्रमाणों के आधार पर हो और निर्दोष विद्यार्थियों के भविष्य को अनिश्चितकाल तक प्रभावित न किया जाए।
लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला विद्यार्थी भी जरूरी है और संस्थाओं का सम्मान करने वाला नागरिक भी। असहमति की आवाज दबाना लोकतंत्र नहीं, लेकिन असहमति के नाम पर संस्थाओं की गरिमा को चोट पहुंचाना भी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता नहीं है। इन दोनों के बीच संतुलन ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।


