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Sunday, August 16, 2026

भारत-पाक संबंधों में अविश्वास गहरा, लेकिन भारत की राह अलग

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भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि भौगोलिक रूप से दोनों देश पड़ोसी हैं, इतिहास और संस्कृति के अनेक सूत्र साझा करते हैं, लेकिन राजनीतिक और सामरिक स्तर पर दोनों के बीच अविश्वास लगातार गहराता गया है। अमेरिकी प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे में सामने आए आंकड़े इसी कड़वी वास्तविकता की ओर संकेत करते हैं। पाकिस्तान में बड़ी संख्या में लोग भारत को अपने देश के लिए गंभीर खतरा मानते हैं, वहीं भारत में भी पाकिस्तान को प्रमुख सुरक्षा और राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाता है।
यह स्थिति केवल दो देशों की जनता के बीच बनी धारणा का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे दशकों का संघर्ष, आतंकवाद, सीमा विवाद, युद्ध और बदलती क्षेत्रीय राजनीति मौजूद है। खास बात यह है कि दोनों देशों की जनता के बीच तनाव के बावजूद बेहतर संबंधों की इच्छा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यही वह बिंदु है, जहां भविष्य की संभावनाएं छिपी हुई हैं।
सर्वे का एक महत्वपूर्ण पहलू दोनों देशों की विदेश नीति को लेकर जनता की अलग-अलग प्राथमिकताओं से जुड़ा है। भारतीयों की पहली पसंद रूस और पाकिस्तानियों की चीन की ओर झुकाव इस बात को दर्शाता है कि दक्षिण एशिया की भू-राजनीति किस तरह बदल रही है।
भारत के लिए रूस केवल एक सामरिक साझेदार नहीं, बल्कि दशकों से रक्षा, ऊर्जा और कूटनीतिक सहयोग का महत्वपूर्ण आधार रहा है। दूसरी ओर अमेरिका के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, तकनीक, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तेजी से मजबूत हुए हैं। चीन के साथ सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद भारत संवाद के रास्ते को भी खुला रखे हुए है।
यही भारत की विदेश नीति की विशिष्टता है—भारत किसी एक शक्ति के खेमे में पूरी तरह बंधने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग देशों के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश करता है।
पाकिस्तान की विदेश नीति में चीन का महत्व लगातार बढ़ा है। आर्थिक, सामरिक और बुनियादी ढांचे से जुड़े सहयोग ने दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दी है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और रक्षा सहयोग इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
भारत को लेकर पाकिस्तान की जनता में व्यापक नकारात्मक धारणा का एक कारण वहां लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक और सामरिक बहस भी है। दूसरी ओर भारत में पाकिस्तान के प्रति अविश्वास का सबसे बड़ा आधार सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा संबंधी घटनाएं रही हैं।
इसलिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि दोनों देशों की जनता एक-दूसरे को पसंद नहीं करती। वास्तविक प्रश्न यह है कि राजनीतिक नेतृत्व और संस्थाएं किस तरह की परिस्थितियां पैदा करती हैं, जिनमें जनता की धारणा बनती और बदलती है।
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने भारत-पाकिस्तान संबंधों को एक बार फिर गंभीर संकट में डाल दिया। हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया और ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंकी ढांचे को निशाना बनाया।

इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव तेजी से बढ़ा। सिंधु जल संधि को लेकर भारत के कदम और पाकिस्तान की तीखी प्रतिक्रिया ने विवाद को सुरक्षा के साथ-साथ जल संसाधनों के स्तर तक पहुंचा दिया। यह स्थिति बताती है कि भारत-पाक संबंध अब केवल सीमा और आतंकवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पानी, व्यापार, कूटनीति और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन भी इनके महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह एक साथ कई शक्तियों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाए। रूस के साथ पारंपरिक संबंध, अमेरिका के साथ बढ़ता रणनीतिक सहयोग और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा—इन तीनों को एक साथ साधना आसान काम नहीं है।
लेकिन यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा भी है। भारत का हित किसी एक देश के साथ अत्यधिक निर्भरता में नहीं, बल्कि विभिन्न शक्तियों के साथ अपने हितों के अनुरूप संबंध रखने में है।
आज दुनिया एक नए शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रही है। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक समीकरण बदल दिए हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र सामरिक राजनीति का केंद्र बन रहा है। ऐसे समय में भारत के लिए स्वतंत्र विदेश नीति पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में एक और सवाल उठता है—क्या केवल सैन्य शक्ति और कड़े बयान स्थायी समाधान दे सकते हैं?
इसका उत्तर सरल नहीं है। आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कठोरता आवश्यक है, लेकिन दीर्घकालीन शांति के लिए संवाद के रास्ते भी पूरी तरह बंद नहीं किए जा सकते। दोनों देशों के बीच व्यापार, लोगों के संपर्क, सांस्कृतिक संबंध और मानवीय मुद्दों को भी भविष्य में महत्व देना होगा।
पाकिस्तान को भी यह समझना होगा कि आतंकवाद को विदेश नीति के औजार के रूप में इस्तेमाल करने की नीति अंततः उसके अपने आर्थिक और कूटनीतिक हितों को नुकसान पहुंचाती है। भारत के लिए भी चुनौती यही है कि वह सुरक्षा से समझौता किए बिना क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में अपनी भूमिका बनाए रखे।
अमेरिकी सर्वे का सबसे बड़ा संदेश केवल यह नहीं है कि भारत को पाकिस्तान से खतरा महसूस होता है या पाकिस्तान भारत को खतरा मानता है। असली संदेश यह है कि दक्षिण एशिया में अविश्वास की राजनीति कितनी गहरी हो चुकी है।
फिर भी उम्मीद की गुंजाइश समाप्त नहीं हुई है। यदि दोनों देशों के नेतृत्व आतंकवाद, सीमा विवाद और आपसी अविश्वास जैसे मूल मुद्दों पर गंभीरता से काम करें, तो परिस्थितियां बदल सकती हैं।
भारत आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रहा है और वैश्विक राजनीति में उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में भारत की विदेश नीति का लक्ष्य केवल पाकिस्तान को जवाब देना नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखना होना चाहिए।
भारत को अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहते हुए रूस, अमेरिका, यूरोप, जापान, पश्चिम एशिया और अन्य देशों के साथ संबंध मजबूत करने होंगे। यही बहुआयामी कूटनीति भारत को किसी एक ध्रुव पर निर्भर होने से बचाएगी।
पाकिस्तान के साथ संबंधों में भी भारत को स्पष्ट नीति रखनी होगी,आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता, लेकिन शांति की संभावना के लिए दरवाजा खुला।
यही संतुलन आने वाले समय में भारत की ताकत भी होगा और उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी पहचान भी।

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