फर्रुखाबाद
प्रदेश के आलू उत्पादक क्षेत्रों में इस समय गहरा आर्थिक संकट देखने को मिल रहा है। ‘सब्जियों का राजा’ कहलाने वाला आलू पिछले दो वर्षों से मंदी की मार झेल रहा है, जिससे किसानों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। इस गंभीर मुद्दे पर अशोक कटियार, निदेशक आलू विकास विपणन सहकारी संघ ने चिंता जताते हुए कहा कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाने वाला आलू आज किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गया है।
उन्होंने बताया कि आलू बेल्ट के कई जिलों में किसान अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं पा रहे हैं। महंगी लागत—खाद, बीज और सिंचाई खर्च—के बावजूद बाजार में कीमतें इतनी गिर चुकी हैं कि लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। परिणामस्वरूप किसान कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं और कई स्थानों पर आलू को सड़कों पर फेंकने तक की नौबत आ रही है।
अशोक कटियार ने कहा कि यह विडंबना है कि एक ओर देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बन रहा है, वहीं दूसरी ओर किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा। उन्होंने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि अधिक उत्पादन करने वाला किसान ही सबसे ज्यादा नुकसान झेल रहा है, जबकि उसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
उन्होंने वैश्विक परिप्रेक्ष्य का जिक्र करते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार दुनिया के कई देश आज भी भुखमरी और खाद्यान्न संकट से जूझ रहे हैं, जबकि भारत में अधिक उत्पादन के कारण फसलें बर्बाद हो रही हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वय और बेहतर वितरण व्यवस्था बनाई जाए, तो किसानों को राहत मिलने के साथ-साथ वैश्विक भूखमरी की समस्या को भी कम किया जा सकता है।
अंत में उन्होंने सरकार से मांग की कि आलू के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, भंडारण सुविधाओं और निर्यात नीति को मजबूत किया जाए, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित लाभ मिल सके और कृषि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे।


