सौरभ टंडन
भारत एक युवा देश है। आबादी का बड़ा हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र का है और यही वर्ग आज देश की दिशा और दशा तय करने की क्षमता रखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह युवा शक्ति सही दिशा में आगे बढ़ रही है, या फिर नीतिगत उपेक्षा, बेरोज़गारी और भ्रम की राजनीति का शिकार बनती जा रही है?
ऊर्जा, सपने और संभावनाएं
यूथ सिर्फ उम्र का नाम नहीं है, यह ऊर्जा, साहस और बदलाव की भूख का प्रतीक है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने संगठित होकर आवाज़ उठाई है, तब-तब देश में बड़े परिवर्तन हुए हैं—चाहे आज़ादी की लड़ाई हो या सामाजिक सुधारों की मुहिम। आज का युवा तकनीक में दक्ष है, वैश्विक सोच रखता है और अपने हक़ को लेकर पहले से ज़्यादा जागरूक है।
आज के युवा के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोज़गार है। डिग्रियां हैं, हुनर है, लेकिन अवसर सीमित हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं की अनिश्चितता ने युवाओं में निराशा पैदा की है। यह निराशा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक असंतोष में बदलती जा रही है।
राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन क्या उनकी आवाज़ सुनी जा रही है? कई बार युवाओं का इस्तेमाल सिर्फ भीड़, नारे और सोशल मीडिया ट्रेंड तक सीमित रह जाता है। असली ज़रूरत है कि युवा नीति निर्माण, शिक्षा सुधार, रोजगार योजनाओं और लोकतांत्रिक संवाद का सक्रिय हिस्सा बनें।
आज का युवा सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी बात तेज़ी से रख सकता है। यह एक बड़ा हथियार है, लेकिन अधूरी जानकारी, अफवाहें और नफ़रत भरी राजनीति इसे खतरे में भी बदल सकती है। ज़रूरत है कि युवा सवाल पूछें, तथ्य जांचें और भावनाओं में बहकर निर्णय न लें।
जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं
यह सच है कि सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे शिक्षा, रोजगार और अवसर उपलब्ध कराएं, लेकिन युवाओं की भी जिम्मेदारी है कि वे सोच-समझकर निर्णय लें, खुद को कौशलयुक्त बनाएं और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करें। बदलाव सिर्फ मांगने से नहीं, भागीदारी से आता है।
यूथ देश का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान है। अगर इस शक्ति को सही दिशा, अवसर और भरोसा मिला, तो भारत को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन अगर युवा हताश, भ्रमित और उपेक्षित रहा, तो इसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा।
आज ज़रूरत है नारे नहीं, नीति, वादे नहीं, रोज़गार, और भीड़ नहीं, सचेत युवा नेतृत्व की। क्योंकि जब युवा जागता है, तभी देश आगे बढ़ता।





