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Friday, July 31, 2026

जर्जर इमारतें: हादसे नहीं, हमारी लापरवाही का परिणाम

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महाराष्ट्र के भिवंडी में चार मंजिला कोहिनूर अपार्टमेंट का ढहना केवल एक दर्दनाक दुर्घटना नहीं है, बल्कि शहरी प्रशासन, भवन सुरक्षा व्यवस्था और हमारी सामूहिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। छह लोगों की मौत और कई अन्य के मलबे में दबे होने की आशंका इस बात का संकेत है कि जर्जर इमारतों का संकट अब केवल किसी एक शहर की समस्या नहीं रह गया है। यह देश के अनेक पुराने शहरों में तेजी से उभरती ऐसी चुनौती है, जिस पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो ऐसे हादसे बार-बार दोहराए जाएंगे।

देश के महानगरों और औद्योगिक शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जिन्हें वर्षों पहले खतरनाक घोषित किया जा चुका है। नगर निकाय समय-समय पर नोटिस जारी करते हैं, लेकिन उसके बाद कार्रवाई अक्सर कागजों तक सीमित रह जाती है। कहीं पुनर्वास की व्यवस्था अधूरी रहती है तो कहीं भवन मालिक और किरायेदार कानूनी विवादों में उलझ जाते हैं। परिणाम यह होता है कि लोग खतरे को जानते हुए भी उन्हीं इमारतों में रहने को मजबूर रहते हैं। जब तक कोई बड़ी दुर्घटना नहीं होती, तब तक प्रशासनिक मशीनरी भी सक्रिय दिखाई नहीं देती।

भिवंडी की घटना यह भी बताती है कि केवल किसी भवन को जर्जर घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी इमारत में मरम्मत का कार्य चल रहा था, तो वहां सुरक्षा मानकों का पालन कितना हुआ, क्षेत्र को कितना सुरक्षित बनाया गया और लोगों के प्रवेश पर कितनी निगरानी रखी गई, जैसे सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। यदि लोगों को पहले ही बाहर निकाला गया था, तो फिर वे दोबारा भीतर कैसे पहुंच गए? ऐसी परिस्थितियां प्रशासनिक निगरानी और समन्वय की कमी की ओर संकेत करती हैं।

शहरीकरण की तेज रफ्तार ने पुराने भवनों पर दबाव बढ़ा दिया है। कई इमारतें अपनी निर्धारित आयु पूरी कर चुकी हैं, लेकिन उनका नियमित संरचनात्मक परीक्षण नहीं होता। भवनों की मजबूती की जांच, समय पर मरम्मत और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित पुनर्विकास की प्रक्रिया को अनिवार्य बनाना होगा। इसके साथ ही स्थानीय निकायों को आधुनिक तकनीक की मदद से जोखिम वाले भवनों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए, ताकि उनकी नियमित निगरानी की जा सके।

इस प्रकार की घटनाओं में सबसे अधिक पीड़ा उन परिवारों को होती है, जो एक पल में अपने प्रियजनों को खो देते हैं। राहत और बचाव अभियान आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि ऐसी नौबत ही न आए। प्रत्येक हादसे के बाद जांच समिति गठित होती है, रिपोर्ट तैयार होती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। यदि दोष तय करने और जिम्मेदार अधिकारियों व संबंधित पक्षों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई की परंपरा विकसित नहीं होगी, तो लापरवाही का सिलसिला भी नहीं रुकेगा।

भिवंडी का हादसा एक चेतावनी है कि शहरी सुरक्षा को अब प्राथमिकता देनी होगी। जर्जर भवनों की पहचान, पुनर्वास की प्रभावी व्यवस्था, सख्त निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना सुरक्षित शहरों का सपना अधूरा रहेगा। किसी भी विकसित समाज की पहचान केवल ऊंची इमारतों से नहीं होती, बल्कि उन इमारतों में रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा से होती है। यदि इस दुर्घटना से भी हम सबक नहीं लेते, तो आने वाले समय में ऐसे हादसे केवल समाचार नहीं, बल्कि हमारी प्रशासनिक असफलता का स्थायी प्रतीक बन जाएंगे।

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