भरत चतुर्वेदी
जब भी शोषण, भेदभाव, अवसरों की कमी या सामाजिक अन्याय की चर्चा होती है, तो अधिकांश लोग तुरंत व्यवस्था, दूसरी जातियों, दूसरे वर्गों या बाहरी शक्तियों को दोष देने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो हमारी हर विफलता का कारण कोई दूसरा है। लेकिन यदि हम थोड़ी देर के लिए भावनाओं से ऊपर उठकर निष्पक्ष दृष्टि से अपने आसपास देखें, तो एक ऐसा सच दिखाई देता है जिसे स्वीकार करना आसान नहीं होता।
वह सच यह है कि हर शोषण बाहर से नहीं आता। कई बार उसकी शुरुआत अपने घर, अपने परिवार, अपने समाज और अपने ही लोगों से होती है।
यह कड़वा है, लेकिन यथार्थ है। किसी भी समाज में प्रतिभा को सबसे पहले चुनौती बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से मिलती है। जब कोई व्यक्ति आगे बढ़ने लगता है, पहचान बनाने लगता है या अपनी मेहनत से नई ऊंचाइयों को छूने लगता है, तब अक्सर सबसे अधिक बेचैनी उन्हीं लोगों में दिखाई देती है जो स्वयं को उसका अपना कहते हैं।
हम अक्सर कहते हैं कि समाज हमारे साथ भेदभाव करता है, लेकिन क्या हमने कभी यह भी देखा कि हमारे अपने समाज में योग्य लोगों के साथ कैसा व्यवहार होता है?
कितने युवाओं को केवल इसलिए अवसर नहीं मिलता क्योंकि वे किसी गुट का हिस्सा नहीं हैं?
कितने प्रतिभाशाली लोगों को इसलिए पीछे कर दिया जाता है क्योंकि उनकी सफलता किसी दूसरे के अहंकार को चोट पहुंचाती है?
कितने लोगों की छवि उनके अपने ही लोग खराब करते हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर बाहर नहीं, हमारे अपने परिवेश में मिल जाएंगे।
प्रतिस्पर्धा बुरी नहीं होती। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को बेहतर बनाती है। लेकिन जब प्रतिस्पर्धा ईर्ष्या में बदल जाती है, तब व्यक्ति दूसरे को गिराकर आगे बढ़ना चाहता है। यही मानसिकता किसी भी समाज की सबसे बड़ी कमजोरी होती है।
कई लोग सामने आपकी प्रशंसा करेंगे, लेकिन पीछे आपकी आलोचना करेंगे। सामने सहयोग का आश्वासन देंगे, लेकिन अवसर आने पर आपका रास्ता रोक देंगे। आपकी उपलब्धियों को स्वीकार करने के बजाय उसमें कमियां खोजेंगे। आपकी मेहनत को भाग्य कह देंगे और आपकी सफलता को संयोग।
ऐसे लोग बाहर के नहीं होते, अक्सर अपने ही होते हैं।
भेदभाव केवल जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं है। यह सोच का भी होता है।एक ही परिवार में बेटों और बेटियों के बीच।
एक ही समाज में संपन्न और साधारण लोगों के बीच।
एक ही संगठन में पुराने और नए लोगों के बीच।
एक ही बिरादरी में प्रभावशाली और सामान्य व्यक्ति के बीच।
इसलिए हर भेदभाव को केवल जातीय चश्मे से देखना वास्तविकता का अधूरा चित्र प्रस्तुत करता है।
यदि किसी समाज को मजबूत बनना है, तो उसे सबसे पहले अपने भीतर झांकना होगा।
क्या हम अपने समाज के प्रतिभाशाली युवाओं को आगे बढ़ाते हैं?
क्या हम किसी की सफलता पर दिल से खुश होते हैं?
क्या हम बिना स्वार्थ किसी का मार्गदर्शन करते हैं?
क्या हम योग्य व्यक्ति को अवसर देते हैं, या केवल अपने पसंदीदा लोगों को?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर “नहीं” है, तो समस्या बाहर कम और भीतर अधिक है।
जो व्यक्ति मेहनत करता है, संघर्ष करता है और अपने दम पर पहचान बनाता है, उसका सबसे बड़ा संघर्ष हमेशा संसाधनों से नहीं होता। उसका संघर्ष उन लोगों से होता है जो उसकी उड़ान देखकर असहज हो जाते हैं।
वे चाहते हैं कि व्यक्ति उनके बराबर रहे, उनसे आगे न निकले।
यहीं से षड्यंत्र शुरू होते हैं।
चरित्र हनन शुरू होता है।
अफवाहें फैलती हैं।
छोटी-छोटी गलतियों को बड़ा बनाया जाता है।
समाज इसलिए पीछे नहीं रहता क्योंकि उसके पास प्रतिभा नहीं होती। समाज इसलिए पीछे रह जाता है क्योंकि वह अपनी प्रतिभाओं को पहचानने और स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाता।
दूसरों को दोष देकर कुछ समय के लिए मन को संतोष मिल सकता है, लेकिन समाधान नहीं मिलता।यदि हम चाहते हैं कि हमारे साथ भेदभाव न हो, तो हमें भी अपने व्यवहार में भेदभाव समाप्त करना होगा।
यदि हम सम्मान चाहते हैं, तो पहले दूसरों का सम्मान करना होगा।
यदि हम सहयोग चाहते हैं, तो पहले सहयोग देना होगा।
यदि हम चाहते हैं कि कोई हमारा हाथ पकड़े, तो पहले हमें किसी और का हाथ पकड़ना सीखना होगा।
समाज को बदलने की शुरुआत संसद, अदालत या सड़क से पहले हमारे मन से होती है। जब तक हम हर असफलता का दोष दूसरों पर डालते रहेंगे, तब तक परिवर्तन अधूरा रहेगा। लेकिन जिस दिन हम यह स्वीकार कर लेंगे कि कई बार हमारी सबसे बड़ी बाधा हमारी अपनी संकीर्ण सोच, ईर्ष्या और आपसी खींचतान होती है, उसी दिन सुधार की दिशा में पहला कदम उठ जाएगा।
याद रखिए,दूसरों पर उंगली उठाते समय हमारी तीन उंगलियां हमारी ओर ही होती हैं। इसलिए समाज को बदलने से पहले अपने आचरण, अपने विचार और अपने आभामंडल को बदलना होगा। जिस दिन अपने लोग अपने लोगों को आगे बढ़ाना सीख जाएंगे, उस दिन बाहरी भेदभाव की ताकत भी बहुत छोटी पड़ जाएगी। यही आत्ममंथन किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति का आधार है।
“समाज पर उंगली उठाना आसान है, लेकिन अपने आंगन में झांकना सबसे कठिन।”


