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Wednesday, July 29, 2026

व्यक्तिपूजा से परे राष्ट्रधर्म की तत्वपूजा और सांगठनिक स्वायत्तता का अनूठा मॉडल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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 अशोक भाटिया , वसई

भारतीय उपमहाद्वीप की सनातन सांस्कृतिक चेतना में ‘गुरु’ शब्द केवल एक मार्गदर्शक का सूचक नहीं है, बल्कि वह अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाली एक सार्वभौमिक ऊर्जा का प्रतीक है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरु पूर्णिमा का उत्सव आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। संघ के नियमों के अनुसार, यह उत्सव अनिवार्य रूप से इसी तिथि को या इसके आस-पास की तिथियों पर सभी शाखाओं में आयोजित किया जाता है। उदाहरण के रूप में स्वामी विवेकानन्द शाखा वसंतनगरी वसई ( मुंबई ) में रविवार दिनांक 2 अगस्त को मनाया जा रहा है क्योंकि अधिकतर स्वयं सेवकों को उस दिन अवकाश होता है .

गौरतलब है कि समकालीन भारत के सामाजिक और वैचारिक परिदृश्य में जब हम किसी संगठन द्वारा इस उत्सव को पूरी सांगठनिक शक्ति और दार्शनिक गहराई के साथ मनाते हुए देखते हैं, तो ध्यान स्वतः ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर जाता है। संघ के वैचारिक और व्यावहारिक कैलेंडर में वर्ष भर में छह प्रमुख राष्ट्रीय उत्सव मनाए जाते हैं—वर्ष प्रतिपदा, हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव, गुरु पूर्णिमा, रक्षाबंधन, विजयदशमी और मकर संक्रांति। इन सभी में गुरु पूर्णिमा का स्थान अत्यंत अनूठा और केंद्रीय है। यह उत्सव केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह संघ की कार्यपद्धति, उसके लोकतांत्रिक ढांचे, वित्तीय शुचिता और ‘व्यक्तिपूजा’ के निषेध की आधारशिला है।

वर्ष 1925 में नागपुर के मोहिते बाड़े में जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की, तब उनके सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह था कि इस नवजात संगठन का वैचारिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शक कौन होगा? वह दौर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अत्यंत उथल-पुथल भरा दौर था। देश में महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक (जिनका अवसान हो चुका था लेकिन प्रभाव बाकी था), और वीर सावरकर जैसे महान नायकों का वैचारिक प्रभाव था। समाज में किसी एक प्रभावशाली व्यक्ति को गुरु मान लेना या स्वयं को गुरु के रूप में स्थापित कर देना डॉ. हेडगेवार के लिए बहुत आसान था। स्वयं डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व ऐसा था कि स्वयंसेवक उन्हें अत्यंत आदर से ‘डॉक्टर जी’ कहते थे और उनके प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे।

परंतु, एक दूरद्रष्टा राष्ट्र-शिल्पी की तरह डॉ. हेडगेवार इतिहास की उन गलतियों से वाकिफ थे, जिन्होंने अतीत में कई बड़े आंदोलनों और संगठनों को नष्ट कर दिया था। वे जानते थे कि मनुष्य, चाहे वह कितना भी महान, त्यागी या तपस्वी क्यों न हो, अंततः हाड़-मांस का पुतला होता है। मनुष्य के जीवन में वैचारिक स्खलन हो सकता है, समय के साथ उसकी शारीरिक और मानसिक क्षमताएं सीमित हो सकती हैं, और सबसे बड़ा खतरा यह कि व्यक्ति के भीतर ‘अहंकार’ का जन्म हो सकता है। यदि कोई संगठन किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द खड़ा होता है, तो उस व्यक्ति के जाते ही संगठन बिखर जाता है या फिर व्यक्तिपूजा की अंधी गलियों में खो जाता है।

इसलिए, वर्ष 1928 में जब संघ में पहली बार आधिकारिक रूप से गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाया गया, तो डॉ. हेडगेवार ने स्वयं को या किसी अन्य जीवित महापुरुष को गुरु के आसन पर नहीं बैठाया। उन्होंने सदियों से भारत के त्याग, तपस्या, शौर्य, ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक ‘भगवा ध्वज’ को संघ के ‘परम गुरु’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने स्वयंसेवकों से स्पष्ट कहा कि संघ में गुरु कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि यह पवित्र ध्वज है। यह निर्णय भारतीय सांगठनिक इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ था, जिसने संघ को एक अमूर्त लेकिन अमर विचार से जोड़ दिया।

आज के वैश्विक और भारतीय सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य का यदि सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए, तो एक बहुत बड़ी विसंगति उभरकर सामने आती है—’हाईकमान संस्कृति’ और ‘व्यक्ति-केंद्रित निष्ठा’। चाहे राजनैतिक दल हों, कॉर्पोरेट घराने हों, या फिर आधुनिक सामाजिक और धार्मिक संप्रदाय; अधिकांश संस्थाएं किसी एक चेहरे, एक परिवार या एक सर्वोच्च नेता के करिश्मे पर टिकी हुई हैं। नेता की जय-जयकार ही संगठन का मुख्य स्वर बन जाती है। ऐसे माहौल में संघ का गुरु पूर्णिमा मॉडल एक बिल्कुल अलग और अनुकरणीय विकल्प प्रस्तुत करता है।

संघ में भगवा ध्वज को गुरु मानने का अर्थ है ‘तत्वपूजा’ । भगवा रंग भारत की आध्यात्मिक चेतना का रंग है। यह उगते हुए सूर्य का रंग है, जो अंधकार के नाश का प्रतीक है। यह यज्ञ की अग्नि की लपटों का रंग है, जो सर्वस्व समर्पण और पवित्रता सिखाती है। यह छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य का प्रतीक है और संतों-सभ्यताओं के त्याग का वाचक है।जब एक स्वयंसेवक इस ध्वज के सामने झुकता है, तो वह किसी मनुष्य के सामने नहीं, बल्कि उन शाश्वत मूल्यों के सामने झुकता है जो भारत को ‘भारत’ बनाते हैं। इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि संघ के भीतर ‘अहंकार’ के पनपने की गुंजाइश समाप्त हो गई। संघ के सर्वोच्च पद पर बैठे सरसंघचालक से लेकर एक सामान्य शाखा के स्वयंसेवक तक, सभी उस ध्वज के सामने समान रूप से नतमस्तक होते हैं। यह प्रक्रिया स्वयंसेवकों को यह सिखाती है कि व्यक्ति कितना भी बड़ा हो जाए, वह विचार और राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता। यही कारण है कि पिछले एक शतक के इतिहास में संघ के भीतर कभी भी नेतृत्व को लेकर वैसा विभाजन या बिखराव नहीं देखा गया, जैसा अन्य समकालीन संगठनों में आम बात है।
गुरु पूर्णिमा के उत्सव का दूसरा और व्यावहारिक रूप से सबसे मजबूत स्तंभ है—’गुरु दक्षिणा’ । किसी भी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय संगठन को चलाने के लिए, उसकी गतिविधियों के विस्तार के लिए और देशव्यापी तंत्र को बनाए रखने के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। आधुनिक युग में संगठन इसके लिए कॉर्पोरेट फंडिंग, सरकारी अनुदान, विदेशी चंदे या समाज के चुनिंदा धनी उद्योगपतियों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन इस निर्भरता की एक बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है—संगठन की वैचारिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता का समझौता।आरएसएस ने इस मोर्चे पर जो आत्मनिर्भरता का मॉडल विकसित किया है, वह प्रबंधन के छात्रों के लिए एक शोध का विषय होना चाहिए। संघ वर्ष भर में किसी से कोई चंदा नहीं मांगता, न ही उसकी कोई तय सदस्यता फीस है। वर्ष में केवल एक बार, गुरु पूर्णिमा के दिन, प्रत्येक स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा के कार्यक्रम में शामिल होता है।

इस प्रक्रिया की शुचिता और सादगी देखने योग्य होती है। एक बंद लिफाफे में स्वयंसेवक अपनी सामर्थ्य के अनुसार राशि रखता है। यह राशि एक रुपया भी हो सकती है और लाखों रुपये भी। महत्वपूर्ण बात यह है कि लिफाफे पर राशि का उल्लेख नहीं होता और न ही समाज में इसका कोई दिखावा किया जाता है। यह पूरी तरह से गुप्त और अनाम समर्पण है। इसके पीछे का मनोविज्ञान यह है कि धन देने वाले के भीतर यह अहंकार न आए कि ‘मैं संगठन को चला रहा हूँ’, और कम धन देने वाले के भीतर कोई हीनभावना न आए।
इस गुरु दक्षिणा से एकत्रित होने वाले कोष से ही संघ वर्ष भर अपनी लाखों शाखाओं, प्रचारकों के आवास-प्रवास और सांगठनिक गतिविधियों का संचालन करता है। चूंकि यह पैसा पूरी तरह से अंदरूनी सूत्रों यानी स्वयंसेवकों का होता है, इसलिए संघ किसी भी बाहरी दबाव समूह, उद्योगपति या सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होता। यह वित्तीय स्वायत्तता ही संघ को अपनी विचारधारा पर अडिग रहने और बिना किसी राजनैतिक भय के सामाजिक कार्य करने की अद्वितीय शक्ति प्रदान करती है।

भारत का पारंपरिक समाज लंबे समय तक जातिगत ऊंच-नीच, छुआछूत और सामाजिक स्तरीकरण से ग्रस्त रहा है। कई बार धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में भी यह भेदभाव आड़े आता रहा है। संघ ने गुरु पूर्णिमा के उत्सव को सामाजिक समरसता के एक मूक लेकिन प्रभावी औजार के रूप में इस्तेमाल किया है।संघ की शाखा में और विशेषकर गुरु पूर्णिमा के उत्सव के दिन, सभी स्वयंसेवक एक ही कतार में बैठते हैं। वहां कोई उद्योगपति होता है, कोई प्रशासनिक अधिकारी होता है, तो कोई झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाला मजदूर या समाज के वंचित वर्ग का व्यक्ति होता है। भगवा ध्वज के सामने सभी की पहचान केवल एक ‘स्वयंसेवक’ की होती है। जब वे ध्वज को प्रणाम करते हैं और अपनी गुरु दक्षिणा अर्पित करते हैं, तो जाति, वर्ग, भाषा और प्रांत के सारे कृत्रिम भेद पिघल जाते हैं।

यह उत्सव समाज को यह संदेश देता है कि राष्ट्र कार्य के लिए सामूहिक प्रयास और समानता अनिवार्य शर्त हैं। संघ के इस मॉडल ने बिना किसी बड़े शोर-शराबे या आंदोलनों के, जमीनी स्तर पर लाखों हिंदुओं को एक सूत्र में पिरोने और उनके भीतर से जातिगत श्रेष्ठता के बोध को समाप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह सामाजिक बदलाव का एक ‘साइलेंट इवोल्यूशन’ (शांत क्रांति) है।

यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयं को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन भारतीय राजनीति पर इसके परोक्ष प्रभाव और इसके स्वयंसेवकों की राजनैतिक उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। इस परिप्रेक्ष्य में, संघ का गुरु पूर्णिमा उत्सव आधुनिक राजनैतिक दलों के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का विषय प्रस्तुत करता है।

आज भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संकट क्या है? अधिकांश राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि आंतरिक लोकतंत्र का अभाव, वंशवाद और क्षत्रपों की व्यक्तिपूजा ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे कमजोर कड़ियाँ हैं। पार्टियाँ एक व्यक्ति या एक परिवार की जागीर बन जाती हैं। जब वह व्यक्ति कमजोर होता है, तो पूरी पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।

इसके विपरीत, संघ की व्यवस्था को देखें। संघ ने एक ऐसा कैडर तैयार किया है जो किसी व्यक्ति विशेष का अंधभक्त नहीं है, बल्कि वह एक विचार (राष्ट्रवाद) और एक प्रतीक (भगवा ध्वज) के प्रति प्रतिबद्ध है। यही कारण है कि संघ से निकले स्वयंसेवक जब राजनीति या अन्य क्षेत्रों में जाते हैं, तो वे एक मजबूत सांगठनिक अनुशासन का प्रदर्शन करते हैं। संघ का यह मॉडल यह सिद्ध करता है कि यदि संस्थाओं को दीर्घजीवी और प्रभावी बनाना है, तो उन्हें ‘करिश्माई व्यक्तियों’ के भरोसे छोड़ने के बजाय ‘मजबूत संस्थागत मूल्यों’ और ‘अमूर्त आदर्शों’ पर आधारित करना होगा।

21वीं सदी के इस तकनीकी और भौतिकवादी युग में, जहाँ हर वस्तु और विचार की प्रासंगिकता उसकी तात्कालिक उपयोगिता से मापी जाती है, आरएसएस का गुरु पूर्णिमा उत्सव एक सभ्यतागत स्थिरता का अहसास कराता है। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रों का निर्माण केवल आलीशान इमारतों, जीडीपी के आंकड़ों या सैन्य शक्ति से नहीं होता; बल्कि राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक जड़ों, अपने नैतिक मूल्यों और अपने नागरिकों के भीतर छिपे त्याग भाव से जीवित रहते हैं।

व्यक्तिपूजा के कोलाहल के बीच ‘तत्वपूजा’ का यह मौन उद्घोष, और कॉरपोरेट चंदे के दौर में ‘स्वयं के अंशदान’ से खड़ी आत्मनिर्भरता की यह मीनार—आरएसएस के गुरु पूर्णिमा उत्सव को भारतीय सांगठनिक इतिहास का एक अद्वितीय अध्याय बनाती है। यह उत्सव केवल स्वयंसेवकों के लिए नहीं, बल्कि समाज के हर उस वर्ग के लिए एक महान सीख है जो एक स्थायी, अनुशासित और मूल्य-आधारित समाज या संगठन का निर्माण करना चाहता है। अंततः, भगवा ध्वज को गुरु मानकर संघ यही संदेश देता है कि व्यक्ति आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, लेकिन राष्ट्र का यह सनातन स्वरूप अक्षुण्ण रहना चाहिए।
अशोक भाटिया,
वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार ,लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार
वसई पूर्व – 401208 ( मुंबई )E MAIL – vasairoad.yatrisangh@gmail.com व्हाट्स एप्प 9221232130

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