डॉ विजय गर्ग
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है। कबीरदास जी ने कहा है— “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।” यह दोहा गुरु की महिमा को स्पष्ट करता है। गुरु ही वह प्रकाश हैं जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और जीवन मूल्यों का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसी महान परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए प्रतिवर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का उत्सव है। यह दिन हमें उन सभी गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर देता है जिन्होंने हमारे जीवन को दिशा दी है। माता-पिता से लेकर विद्यालय के शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु, जीवन मार्गदर्शक और समाज के प्रेरणास्रोत—सभी किसी न किसी रूप में हमारे गुरु हैं।
गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से भी है, जिन्हें वेदों का संकलन करने, महाभारत की रचना करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित स्वरूप देने का श्रेय दिया जाता है। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। बौद्ध और जैन धर्म में भी इस दिन का विशेष महत्व है। भगवान बुद्ध ने इसी दिन सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया था, जबकि जैन परंपरा में यह दिन गुरु-शिष्य संबंध की पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
आज के डिजिटल युग में ज्ञान प्राप्त करना पहले की अपेक्षा बहुत आसान हो गया है। इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल संसाधनों ने सूचनाओं का विशाल संसार हमारे सामने खोल दिया है। किंतु सूचना और ज्ञान में अंतर होता है। सूचना हमें तथ्य देती है, जबकि गुरु हमें उन तथ्यों को समझने, उनका सही उपयोग करने और जीवन में नैतिकता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। आधुनिक तकनीक एक सहायक हो सकती है, लेकिन गुरु का स्थान कभी नहीं ले सकती।
एक सच्चा गुरु केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान नहीं देता, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है। वह अनुशासन, सत्यनिष्ठा, करुणा, धैर्य, परिश्रम और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे संस्कारों का विकास करता है। गुरु अपने विद्यार्थियों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें आत्मविश्वास प्रदान करता है और कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
गुरु पूर्णिमा हमें यह भी याद दिलाती है कि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। जीवन का प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक चुनौती और प्रत्येक असफलता भी हमारा गुरु बन सकती है। जो व्यक्ति सीखना बंद कर देता है, उसका विकास भी रुक जाता है। इसलिए जीवनभर जिज्ञासु बने रहना ही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।
विद्यार्थियों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है। गुरु के प्रति सम्मान केवल पुष्प अर्पित करने या समारोह आयोजित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी शिक्षाओं का पालन करना, ईमानदारी से अध्ययन करना, अनुशासित जीवन जीना और समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना ही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
आज जब समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब ऐसे गुरुओं की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है जो केवल सफल पेशेवर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, नैतिक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करें। राष्ट्र निर्माण की नींव मजबूत तभी होगी जब गुरु और शिष्य दोनों ज्ञान के साथ-साथ संस्कारों को भी समान महत्व देंगे।
गुरु पूर्णिमा हमें विनम्रता, कृतज्ञता और समर्पण का संदेश देती है। यह पर्व हमें अपने जीवन में उन सभी व्यक्तियों को याद करने की प्रेरणा देता है जिन्होंने हमें बेहतर इंसान बनने में सहायता की। आइए, इस पावन अवसर पर हम अपने गुरुओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें, उनके आदर्शों का अनुसरण करने का संकल्प लें और ज्ञान, संस्कार तथा मानवता की इस अमूल्य परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास करें।
गुरु पूर्णिमा केवल गुरु का सम्मान करने का पर्व नहीं, बल्कि स्वयं को एक बेहतर विद्यार्थी, बेहतर इंसान और बेहतर नागरिक बनाने का संकल्प लेने का भी पर्व है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


