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Tuesday, July 21, 2026

रीलों का सफर: शौक, हुनर या लत?

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डॉ विजय गर्ग

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में रील्स केवल कुछ सेकंड की वीडियो नहीं रह गई हैं। वे आज मनोरंजन, अभिव्यक्ति, शिक्षा और करियर का एक प्रभावशाली माध्यम बन चुकी हैं। इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म ने लोगों के संवाद और रचनात्मकता के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। आज हर दिन करोड़ों रील्स बनाई और देखी जाती हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या रील्स केवल एक शौक हैं, प्रतिभा दिखाने का मंच हैं, या धीरे-धीरे एक लत बनती जा रही हैं?

 

अभिव्यक्ति का नया माध्यम

 

कुछ वर्ष पहले तक अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए लोगों को मंच, टेलीविजन या समाचार-पत्रों का सहारा लेना पड़ता था। आज एक स्मार्टफोन और इंटरनेट की मदद से कोई भी व्यक्ति अपना गीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला, खाना बनाने की कला, शिक्षण या अन्य प्रतिभा दुनिया के सामने प्रस्तुत कर सकता है।

 

रील्स ने आम लोगों को भी अपनी पहचान बनाने और लाखों दर्शकों तक पहुंचने का अवसर दिया है। अब प्रसिद्धि केवल बड़े कलाकारों तक सीमित नहीं रही।

 

हुनर को मिली नई उड़ान

 

रील्स ने अनेक लोगों के जीवन को नई दिशा दी है। शिक्षक छोटे-छोटे वीडियो के माध्यम से कठिन विषयों को सरल बना रहे हैं। डॉक्टर स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैला रहे हैं। किसान आधुनिक खेती की तकनीकों की जानकारी साझा कर रहे हैं। छोटे व्यापारी अपने उत्पादों का प्रचार कर रहे हैं और कलाकार अपनी कला को वैश्विक मंच तक पहुंचा रहे हैं।

 

आज अनेक युवा कंटेंट क्रिएशन को ही अपना पेशा बना चुके हैं। विज्ञापन, ब्रांड सहयोग और डिजिटल मार्केटिंग के माध्यम से वे सम्मानजनक आय भी अर्जित कर रहे हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो रील्स प्रतिभा को अवसर प्रदान करने वाला एक सशक्त माध्यम हैं।

 

जब शौक बन जाए लत

 

हर तकनीक की तरह रील्स का एक दूसरा पक्ष भी है।

 

कई लोग घंटों तक लगातार रील्स देखते रहते हैं। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा अपने-आप शुरू हो जाता है और समय का पता ही नहीं चलता। धीरे-धीरे यह आदत लत का रूप ले सकती है।

 

इसका प्रभाव पढ़ाई, कार्य, नींद, शारीरिक गतिविधियों और पारिवारिक संबंधों पर पड़ सकता है। विशेष रूप से किशोर और युवा लाइक्स, व्यूज़ और फॉलोअर्स को अपनी सफलता का पैमाना मानने लगते हैं। अपेक्षित प्रतिक्रिया न मिलने पर वे तनाव, निराशा और आत्मविश्वास की कमी का अनुभव कर सकते हैं।

 

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

 

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस प्रकार बनाए गए हैं कि वे उपयोगकर्ताओं का ध्यान अधिक समय तक बनाए रखें। छोटी-छोटी और आकर्षक वीडियो मस्तिष्क को तत्काल आनंद का अनुभव कराती हैं, जिससे बार-बार उन्हें देखने की इच्छा होती है।

 

लगातार रील्स देखने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो सकती है। लंबे समय तक पढ़ने, गंभीर चिंतन करने और धैर्यपूर्वक सीखने की आदत भी प्रभावित हो सकती है। साथ ही, दूसरों की चमकदार जीवनशैली देखकर कई लोग स्वयं की तुलना करने लगते हैं, जिससे मानसिक दबाव बढ़ सकता है।

 

समाज के लिए सकारात्मक योगदान

 

रील्स का उपयोग केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। इनके माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण संरक्षण, वित्तीय साक्षरता और सामाजिक जागरूकता जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण जानकारी भी तेजी से लोगों तक पहुंचाई जा रही है।

 

कई शिक्षक विद्यार्थियों के लिए रोचक शैक्षिक सामग्री तैयार कर रहे हैं। वैज्ञानिक जटिल अवधारणाओं को सरल भाषा में समझा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता जनहित के संदेश प्रसारित कर रहे हैं। इस प्रकार रील्स समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम भी बन सकती हैं।

 

अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका

 

बच्चों और युवाओं को रील्स से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy) सिखाई जाए।

 

अभिभावकों और शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को समय का संतुलित उपयोग, सही सामग्री का चयन, ऑनलाइन सुरक्षा और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार की शिक्षा दें। यदि बच्चे रचनात्मक और ज्ञानवर्धक सामग्री तैयार करते हैं, तो उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

 

संतुलित उपयोग ही सफलता की कुंजी

 

रील्स न तो अपने-आप में अच्छी हैं और न ही बुरी। उनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उनका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।

 

यदि रील्स का उपयोग सीखने, सिखाने, प्रेरित करने और प्रतिभा को विकसित करने के लिए किया जाए, तो वे सफलता का मार्ग बन सकती हैं। लेकिन यदि वे केवल समय बिताने, दिखावे या लोकप्रियता की अंधी दौड़ तक सीमित रह जाएं, तो वे व्यक्ति की उत्पादकता और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर सकती हैं।

 

डिजिटल युग में रील्स हमारी जीवनशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। वे नई पीढ़ी को अपनी प्रतिभा दिखाने, ज्ञान प्राप्त करने और करियर बनाने के अनेक अवसर प्रदान करती हैं। साथ ही, वे समय प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल अनुशासन जैसी नई चुनौतियां भी प्रस्तुत करती हैं।

 

इसलिए आवश्यक है कि हम रील्स को अपनी जिंदगी पर हावी न होने दें, बल्कि उन्हें सीखने, रचनात्मकता और सकारात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाएं। जब रील्स का उपयोग विवेक, संतुलन और जिम्मेदारी के साथ किया जाएगा, तभी उनका सफर शौक से हुनर और हुनर से सफलता की ओर बढ़ेगा, न कि शौक से लत की ओर।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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