36 C
Lucknow
Tuesday, June 2, 2026

आईजीआरएस : शिकायतों का समाधान या सरकारी आंकड़ों का खेल?

Must read

शरद कटियार
उत्तर प्रदेश सरकार ने जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के लिए जिस एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (आईजीआरएस ) को बड़े प्रचार-प्रसार के साथ शुरू किया था, आज उसी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार का उद्देश्य था कि आम नागरिक बिना किसी सिफारिश और दौड़भाग के अपनी शिकायत सीधे प्रशासन तक पहुंचा सके और उसे समयबद्ध न्याय मिले। लेकिन जमीनी हकीकत क्या है?
प्रदेश के हजारों शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उनकी शिकायतों का निस्तारण केवल कागजों और पोर्टल पर किया जा रहा है। कई मामलों में शिकायतकर्ता को यह तक नहीं बताया जाता कि उसकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। पोर्टल पर शिकायत “निस्तारित” दिख जाती है, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि अनेक विभागों में अधिकारी बिना मौके का निरीक्षण किए, बिना शिकायतकर्ता से संपर्क किए और बिना वास्तविक जांच के शिकायतों को बंद कर देते हैं। इससे सरकार के सामने तो निस्तारण का प्रतिशत बढ़ता दिखाई देता है, लेकिन पीड़ित व्यक्ति को न्याय नहीं मिलता।
राजस्व और पुलिस विभाग को लेकर सबसे अधिक शिकायतें सामने आती रही हैं। जमीन विवाद, अवैध कब्जे, पैमाइश, पुलिस कार्रवाई और स्थानीय प्रशासन से जुड़े मामलों में अक्सर शिकायतकर्ताओं का कहना होता है कि उनकी बात सुने बिना ही रिपोर्ट लगा दी जाती है। कई बार शिकायत जिस अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ होती है, जांच भी उसी तंत्र के माध्यम से कराकर मामला बंद कर दिया जाता है।
यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि यदि किसी शिकायत का वास्तव में समाधान हुआ है तो शिकायतकर्ता की संतुष्टि को अंतिम मानक क्यों नहीं बनाया जाता? पोर्टल पर निस्तारण दिखा देने भर से समस्या समाप्त नहीं हो जाती। जब तक शिकायतकर्ता यह न कहे कि उसे न्याय मिला है, तब तक किसी शिकायत को पूरी तरह निस्तारित मानना कैसे उचित हो सकता है?
सरकार को चाहिए कि आईजीआरएस की स्वतंत्र ऑडिट कराई जाए। यादृच्छिक रूप से बंद की गई शिकायतों की जांच हो, शिकायतकर्ताओं से फीडबैक लिया जाए और गलत रिपोर्ट लगाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो जनसुनवाई पोर्टल जनता के लिए न्याय का माध्यम कम और सरकारी आंकड़ों को चमकाने का साधन अधिक बनकर रह जाएगा।
तकनीक व्यवस्था को पारदर्शी बना सकती है, लेकिन ईमानदार क्रियान्वयन का विकल्प नहीं हो सकती। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज शिकायतें फाइलों और आंकड़ों में तो निस्तारित होती रहेंगी, लेकिन आम नागरिक न्याय की तलाश में भटकता रहेगा।

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article