– ऐसा होता तो सिराथू से हार नहीं जाते राजनेता केशव प्रसाद मौर्य जैसे दिग्गज राजनीतिकार
शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की सियासत में हर चुनाव के बाद एक पुराना सवाल फिर जिंदा हो जाता है क्या ईवीएम में “सेटिंग” होती है? 2022 विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद यह बहस और तेज हुई, जब भाजपा के बड़े ओबीसी चेहरे और तत्कालीन डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य खुद सिराथू सीट से करीब 7 हजार वोटों से चुनाव हार गए। यह हार सिर्फ एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि उस पूरे नैरेटिव पर सवाल थी जिसमें दावा किया जाता है कि चुनावी मशीनों से नतीजे तय होते हैं।
अगर सीधी बात करें तो आंकड़े खुद कहानी बताते हैं। भाजपा को लगभग 41 प्रतिशत वोट शेयर मिला, समाजवादी पार्टी को करीब 32 प्रतिशत। कई सीटों पर हार-जीत का अंतर 2 से 5 हजार वोट तक रहा। यानी मुकाबला बेहद करीबी था। ऐसे में यह तर्क कमजोर पड़ जाता है कि अगर “सेटिंग” होती तो सत्ता पक्ष अपने सबसे बड़े नेताओं को क्यों हारने देता? केशव प्रसाद मौर्य की हार इस बहस का सबसे बड़ा उदाहरण बन गई।
ईवीएम को लेकर आरोप 2014 के बाद से लगातार उठते रहे हैं, लेकिन हर बार चुनाव आयोग ने तकनीकी आधार पर इन दावों को खारिज किया है। आयोग का साफ कहना है कि ईवीएम किसी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती, इसमें वन-टाइम प्रोग्रामिंग चिप होती है और हर वोट का VVPAT स्लिप से मिलान संभव है। सुप्रीम कोर्ट भी VVPAT गिनती बढ़ाने के बाद इस सिस्टम को बरकरार रख चुका है। यानी अब तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया जो बड़े पैमाने पर गड़बड़ी साबित कर सके।
असल सवाल मशीन नहीं, जमीन का है। यूथ इंडिया की पड़ताल में सामने आया कि कई सीटों पर सत्ता विरोधी लहर, टिकट वितरण में असंतोष, स्थानीय नेताओं की नाराजगी और जातीय समीकरणों का बदलना हार की बड़ी वजह बने। बूथ मैनेजमेंट में छोटी चूक भी हजारों वोट का फर्क पैदा करती है। सिराथू में भी यही फैक्टर निर्णायक माने गए।
दूसरी तरफ भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह को उनकी चुनावी पकड़ और माइक्रो मैनेजमेंट के कारण “कलयुग का चाणक्य” कहा जाता है। उन्होंने बूथ स्तर तक संगठन खड़ा किया, डेटा आधारित रणनीति लागू की और कार्यकर्ताओं का नेटवर्क मजबूत किया। यही वजह है कि भाजपा लगातार बड़े चुनाव जीतती रही। लेकिन जब हार होती है, तो वही सिस्टम सवालों के घेरे में आ जाता है यही राजनीति की विडंबना है।
सीधी सच्चाई यह है कि चुनाव मशीन नहीं, गणित और मैनेजमेंट जीतता है। अगर ईवीएम ही सब कुछ तय करती, तो बड़े-बड़े मंत्री, सांसद और मुख्यमंत्री तक चुनाव नहीं हारते। भारतीय चुनाव प्रणाली दुनिया की सबसे बड़ी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें करोड़ों वोट पड़ते हैं और हजारों कर्मचारी जुड़ते हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था में बिना ठोस सबूत के “सेटिंग” का दावा करना सियासी रणनीति ज्यादा और तथ्य कम नजर आता है।
युवा मतदाताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि लोकतंत्र का असली खेल बूथ से शुरू होता है जहां एक-एक वोट तय करता है कि सत्ता किसके हाथ में जाएगी। ईवीएम पर बहस जारी रह सकती है, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य की हार एक सीधा संदेश देती है,जनता जब फैसला करती है, तो सबसे मजबूत नेता भी हार सकता है। यही लोकतंत्र की असली ताकत है, और यही उसकी सबसे बड़ी सच्चाई है।
विपक्ष का ईवीएम पर “सेटिंग” का शोर एक भ्रम


