डॉ. विजय गर्ग
भारत के वैज्ञानिकों ने कृषि विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए पहली बार अरहर (तुअर) का संपूर्ण जीनोम अनुक्रम (Genome Sequencing) तैयार कर लिया है। यह सफलता केवल वैज्ञानिक शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, किसानों की आय, जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने की क्षमता और टिकाऊ कृषि के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अरहर भारत की सबसे महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में से एक है और इसकी आनुवंशिक संरचना को समझना भविष्य की कृषि के लिए नए द्वार खोल सकता है।
अरहर भारतीय भोजन का अभिन्न हिस्सा है। प्रोटीन से भरपूर यह दाल करोड़ों लोगों के दैनिक आहार का महत्वपूर्ण स्रोत है, विशेष रूप से उन परिवारों के लिए जो शाकाहारी भोजन पर निर्भर हैं। भारत विश्व में अरहर का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है, फिर भी बढ़ती आबादी और उत्पादन संबंधी चुनौतियों के कारण देश को कई बार दालों का आयात करना पड़ता है। ऐसे में अरहर के पूरे जीनोम का तैयार होना आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।
जीनोम किसी भी जीव की संपूर्ण आनुवंशिक जानकारी का भंडार होता है। इसमें वे सभी जीन शामिल होते हैं जो पौधे की वृद्धि, उत्पादन क्षमता, रोग प्रतिरोधकता, सूखा सहन करने की क्षमता और पोषण गुणवत्ता जैसे गुणों को नियंत्रित करते हैं। जब वैज्ञानिक किसी फसल का पूरा जीनोम पढ़ लेते हैं, तो वे यह समझ सकते हैं कि कौन-से जीन किस विशेषता के लिए जिम्मेदार हैं। यही जानकारी भविष्य में बेहतर किस्मों के विकास का आधार बनती है।
इस उपलब्धि का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलेगा। जीनोमिक जानकारी के आधार पर वैज्ञानिक ऐसी नई किस्में विकसित कर सकेंगे जो अधिक उत्पादन दें, कम पानी में भी अच्छी तरह बढ़ें, कीटों और रोगों का बेहतर सामना करें तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल हों। इससे खेती की लागत घटेगी, जोखिम कम होगा और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी।
जलवायु परिवर्तन आज कृषि के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान, लंबे सूखे और नई बीमारियाँ फसलों को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में जीनोम आधारित अनुसंधान वैज्ञानिकों को उन जीनों की पहचान करने में सहायता करेगा जो कठिन परिस्थितियों में भी पौधों को जीवित और उत्पादक बनाए रखते हैं। इससे भविष्य की जलवायु-सहिष्णु फसलें विकसित करना आसान होगा।
अरहर का जीनोम तैयार होने से पोषण सुरक्षा को भी बल मिलेगा। वैज्ञानिक ऐसे पौधों का विकास कर सकेंगे जिनमें प्रोटीन, आवश्यक अमीनो अम्ल, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा अधिक हो। इससे कुपोषण से लड़ने और संतुलित आहार उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं।
यह उपलब्धि आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और पारंपरिक पौध प्रजनन के बीच एक मजबूत पुल का काम करेगी। जीनोम की जानकारी का उपयोग करके वैज्ञानिक पारंपरिक संकरण (Breeding) को अधिक सटीक, तेज़ और प्रभावी बना सकेंगे। इससे नई किस्मों को विकसित करने में लगने वाला समय भी कम होगा और किसानों तक उन्नत बीज जल्दी पहुँच सकेंगे।
यह सफलता भारत की वैज्ञानिक क्षमता का भी प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय वैज्ञानिकों ने कृषि जैव प्रौद्योगिकी, जीनोमिक्स और फसल सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत केवल खाद्यान्न उत्पादन में ही नहीं, बल्कि अत्याधुनिक कृषि अनुसंधान में भी विश्व के अग्रणी देशों में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है।
हालाँकि, किसी भी वैज्ञानिक खोज का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब उसका प्रभावी उपयोग खेतों तक पहुँचे। इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, सरकार, बीज कंपनियों और किसानों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक होगा। साथ ही, जैव सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और किसानों के हितों का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
अंततः, अरहर के संपूर्ण जीनोम की तैयारी भारतीय कृषि विज्ञान की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह केवल एक वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा, पोषण, टिकाऊ कृषि और किसानों की समृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यदि इस उपलब्धि का सही ढंग से उपयोग किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत दाल उत्पादन में और अधिक आत्मनिर्भर बनेगा तथा विश्व कृषि अनुसंधान में अपनी अग्रणी भूमिका को और मजबूत करेगा।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


