नई दिल्ली: रियल एस्टेट कारोबारी युवराज सिंह मनचंदा (Yuvraj Singh Manchanda) की मौत के मामले में गुरुग्राम पुलिस की कार्यप्रणाली पर साकेत कोर्ट (Saket Court) ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने शव को संभालने, उसकी पहचान कराने, पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कथित लापरवाही को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने कहा कि मामले में जिस तरह से निर्धारित नियमों की अनदेखी किए जाने की बात सामने आई है, उससे सबूत मिटाने में पुलिस अधिकारियों और सिविल अस्पताल के एक डॉक्टर की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने शव को सुरक्षित रखने से लेकर उसकी पहचान और पोस्टमार्टम तक की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इसके साथ ही अंतिम संस्कार से जुड़ी कार्रवाई को लेकर भी कथित अनियमितताओं पर गंभीरता जताई गई है। साकेत कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए जांच के निर्देश दिए हैं। अदालत ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 238 के तहत मामले की जांच कराने का आदेश दिया है।
यह मामला युवराज सिंह मनचंदा की बहन हरसिमरन की ओर से दाखिल याचिकाओं के बाद अदालत के सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत ने शव को संभालने, पहचान कराने, पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कथित लापरवाही को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने गुरुग्राम के DCP को आदेश की एक प्रति भेजने और मामले में अब तक की गई जांच की रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करने को कहा है। अदालत ने यह भी कहा कि मामले में नियमों की कथित अनदेखी और सबूतों से संबंधित पहलुओं की जांच जरूरी है।
रियल एस्टेट कारोबारी युवराज सिंह मनचंदा की मौत के मामले में साकेत कोर्ट ने बादशाहपुर थाने की पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत के मुताबिक युवराज का शव 10 सितंबर को मिला था, लेकिन शव की फोटो और पहचान से जुड़ी जानकारी ZIPNET पर 16 सितंबर को अपलोड की गई। यानी शव मिलने के करीब छह दिन बाद यह जानकारी ऑनलाइन डाली गई।
अदालत ने इस देरी को गंभीर लापरवाही माना है। कोर्ट के मुताबिक, जब तक ZIPNET पर शव की तस्वीर और पहचान संबंधी जानकारी अपलोड की गई, तब तक शव का अंतिम संस्कार भी हो चुका था।अदालत ने कहा कि शव मिलने के बाद के शुरुआती दिन उसकी पहचान के लिए बेहद महत्वपूर्ण थे। जानकारी अपलोड करने में हुई छह दिन की देरी के कारण पहचान की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
कोर्ट के मुताबिक, पुलिस की इस कथित देरी का असर सिर्फ जांच पर नहीं पड़ा, बल्कि परिवार भी अपने भाई के शव की पहचान करने और उसका अंतिम संस्कार करने के अधिकार से वंचित रह गया। अदालत ने शव को संभालने, पहचान कराने, पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार से जुड़ी पूरी प्रक्रिया में सामने आई कथित खामियों को गंभीरता से लिया है।


