प्रवीन कटियार
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां एक-एक बूंद पानी की कीमत है, वहीं जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है,गांवों में समर,हैंडपंप,सबमर्सिबल चलाकर छोड़ देना, घरों की टंकियों का ओवरफ्लो होना और नल खुले छोड़ देना अब आम आदत बन चुकी है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि आने वाले जल संकट की नींव है।
देश में पानी की स्थिति को लेकर आंकड़े बेहद गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत की करीब 60 करोड़ आबादी जल संकट का सामना कर रही है। हर साल लगभग 2 लाख लोगों की मौत सुरक्षित पेयजल की कमी के कारण होती है। भारत के 21 बड़े शहरों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिनमें दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहर शामिल हैं।
गांवों में स्थिति और चिंताजनक है। एक अनुमान के मुताबिक, यदि कोई समर या नल सिर्फ 1 घंटे खुला रह जाए तो लगभग 1000 से 1500 लीटर पानी व्यर्थ बह जाता है। यानी एक गांव में अगर रोज 10 घर भी ऐसा करें तो प्रतिदिन 10,000 लीटर से अधिक पानी नालियों में बह जाता है। यही पानी खेती, पशुपालन और पीने के लिए उपयोगी हो सकता था।
सरकार द्वारा ‘जल जीवन मिशन’ के तहत हर घर नल योजना चलाई जा रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर जागरूकता की कमी के कारण इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। टंकियां भरने के बाद भी नल बंद नहीं किए जाते, जिससे लाखों लीटर पानी रोज बर्बाद हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले 10–15 वर्षों में कई ग्रामीण क्षेत्र गंभीर जल संकट की चपेट में आ सकते हैं। भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और बारिश का पानी भी पर्याप्त मात्रा में संरक्षित नहीं हो पा रहा।समाधान भी हमारे बीच ही है, बस जरूरत है एक व्यापक जनजागरण अभियान की।
प्राथमिक स्कूलों के बच्चों द्वारा गांव-गांव “पानी बचाओ रैली” निकाली जाए,ग्राम प्रधान और जनप्रतिनिधि नियमित रूप से जल संरक्षण कार्यक्रम आयोजित करें
हर घर में ओवरफ्लो अलार्म या समयबद्ध मोटर उपयोग की आदत डाली जाए।
वर्षा जल संचयन (राइन्वाटर हार्वेस्टिंग ) को अनिवार्य बनाया जाए।सवाल सिर्फ आज का नहीं, आने वाली पीढ़ियों का है हम उन्हें क्या सौंपेंगे, सूखी धरती या सुरक्षित भविष्य?
अगर आज भी नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब पानी के लिए संघर्ष ही नहीं, संघर्ष की वजह से सामाजिक टकराव भी बढ़ेंगे। अब वक्त है,हर बूंद को बचाने का, क्योंकि पानी ही जीवन है और इसकी बर्बादी, भविष्य के साथ सबसे बड़ा अन्याय।


