सपने जैसा सहज व सुंदर
एक अनजाना सा अपनापन।
सरल शांत और गहरेपन के
एहसासों से भरा हुआ मन।।
शब्द जहां सब मौन हो गये
स्पंदन भी शांत हो गये।
न कोई आशा न अनुबंध
अनजाने आबंध बन गये!
उलझन के इस गहन सफर में
छाया के पल ढूंढ रहा मन।
सरल शांत और गहरेपन सा
एक अनजाना सा अपनापन।
राहें ही जब अलग अलग थीं
हमराही बनते फिर कैसे !
कदम एक न उठा साथ मे।
दूरी तब होती कम कैसे !
भूली-बिसरी उन यादों से
मन के सोए साज जगाएं।
बीत गया जो समय पुराना
उस पर क्यों अफसोस मनाएं।
समय भी जिसको खोल न पाया
नेह का ये मर्यादित बंधन।
सपने जैसा सहज व सुंदर
एक अनजाना सा अपनापन ||
✍️ डाॅ. धीरेन्द्र सिंह गंगवार


