वाशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच हुए अस्थायी युद्धविराम को लेकर कूटनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। पूर्व भारतीय राजनयिक अशोक सज्जनहार ने इस समझौते पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऐसे हालात में हर पक्ष खुद को विजेता बताता है, लेकिन हकीकत में युद्ध का कोई स्पष्ट विजेता नहीं होता।
उन्होंने कहा कि इस संघर्ष विराम के बाद ईरान अमेरिका और इजरायल तीनों ही अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सामान्य पैटर्न है, जहां कूटनीतिक समझौते के बाद हर पक्ष अपने हितों के अनुसार स्थिति को प्रस्तुत करता है।
अशोक सज्जनहार के अनुसार, किसी भी अस्थायी समझौते में यह जरूरी होता है कि सभी पक्ष अपने-अपने देश में इसे “सफलता” के रूप में पेश करें, ताकि घरेलू राजनीतिक दबाव को संतुलित किया जा सके।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि युद्ध चाहे छोटा हो या बड़ा, अंततः उसका कोई वास्तविक विजेता नहीं होता। सबसे ज्यादा नुकसान आम नागरिकों और क्षेत्रीय स्थिरता को उठाना पड़ता है।
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस युद्धविराम को एक सकारात्मक कदम के रूप में देख रहा है। नेपाल ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे क्षेत्र में शांति और स्थिरता की दिशा में अहम पहल बताया है।
नेपाल सरकार ने अपने बयान में कूटनीति, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान पर जोर देते हुए कहा कि यह युद्धविराम आगे की बातचीत के लिए अवसर प्रदान कर सकता है।
हालांकि, इस समझौते के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। पश्चिम एशिया के कई हिस्सों में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, जिससे युद्धविराम के टिके रहने पर सवाल उठ रहे हैं।
विशेष रूप से लेबनान में जारी सैन्य गतिविधियों ने इस अस्थायी शांति को खतरे में डाल दिया है। इससे पूरे क्षेत्र में फिर से तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
ईरान ने अमेरिका और इस्राइल पर युद्धविराम की शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। तेहरान का कहना है कि समझौते के कुछ प्रमुख बिंदुओं का पालन नहीं किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि इन आरोपों के चलते आगामी कूटनीतिक वार्ता भी प्रभावित हो सकती है। यहां तक कि ईरान ने इस्लामाबाद में प्रस्तावित बातचीत से बाहर निकलने की चेतावनी भी दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के युद्धविराम केवल अस्थायी राहत देते हैं। यदि मूल मुद्दों का समाधान नहीं होता, तो संघर्ष दोबारा भड़क सकता है।


