वॉशिंग्टन
अमेरिका में ट्रांसजेंडर छात्रों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर बड़ा नीति बदलाव सामने आया है। सोमवार को अमेरिकी शिक्षा विभाग ने पांच स्कूल जिलों और एक कॉलेज के साथ किए गए पुराने समझौतों को समाप्त करने की घोषणा कर दी। यह कदम ऐसे समय पर उठाया गया है जब देश में जेंडर पहचान और शिक्षा अधिकारों पर बहस तेज होती जा रही है।
शिक्षा विभाग के इस फैसले का सीधा असर उन नीतियों पर पड़ेगा, जिनके तहत ट्रांसजेंडर छात्रों को सुरक्षा और समान अवसर सुनिश्चित किए जाते थे। अब विभाग इन समझौतों के अनुपालन में कोई सहायता नहीं करेगा, जिससे संबंधित संस्थानों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
ये समझौते संघीय नागरिक अधिकार कानून के तहत बनाए गए थे और स्कूलों को निर्देश देते थे कि वे छात्रों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव न करें। खास तौर पर जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर सुविधाएं उपलब्ध कराना इनका प्रमुख उद्देश्य था।
जिन स्कूल जिलों पर इसका असर पड़ा है, उनमें डेलावेयर का केप हेनलोपेन स्कूल डिस्ट्रिक्ट, वाशिंगटन का फाइफ स्कूल डिस्ट्रिक्ट और पेंसिलवेनिया का डेलावेयर वैली स्कूल डिस्ट्रिक्ट शामिल हैं। इसके अलावा कैलिफोर्निया के ला मेसा-स्प्रिंग वैली स्कूल डिस्ट्रिक्ट, सैक्रामेंटो सिटी यूनिफाइड और टाफ्ट कॉलेज भी इस फैसले की जद में आए हैं।
इन संस्थानों में पहले से लागू नीतियां ट्रांसजेंडर छात्रों को उनके जेंडर के अनुरूप शौचालय, खेल और अन्य सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित करती थीं। अब इन व्यवस्थाओं के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से ट्रांसजेंडर छात्रों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है। स्कूलों में सुरक्षित वातावरण का अभाव उनके आत्मविश्वास और शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन और बराक ओबामा के कार्यकाल में टाइटल IX कानून की व्याख्या को व्यापक किया गया था। इस विस्तार के तहत ट्रांसजेंडर और समलैंगिक छात्रों को भी सुरक्षा के दायरे में शामिल किया गया था।
हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में प्रशासन ने इस नीति में बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। उनका मानना है कि जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर विशेष सुविधाएं देना कानून की मूल भावना से अलग है।
इसी क्रम में ट्रंप प्रशासन ने कैलिफोर्निया और मिनेसोटा के कुछ स्कूलों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू की है। इन स्कूलों पर आरोप है कि उन्होंने जेंडर पहचान के आधार पर छात्रों को विशेष अधिकार दिए, जो मौजूदा व्याख्या के अनुरूप नहीं हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने अमेरिका में राजनीतिक और सामाजिक बहस को और तेज कर दिया है। एक ओर जहां अधिकार संगठनों ने इस फैसले की आलोचना की है, वहीं कुछ समूहों ने इसे कानून के सही अनुपालन की दिशा में कदम बताया है।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के निर्णयों से स्कूल प्रशासन के सामने नई चुनौतियां खड़ी होंगी। उन्हें अब यह तय करना होगा कि वे छात्रों के अधिकारों और कानूनी दायित्वों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि अदालतें और नीतिगत संस्थाएं इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती हैं। फिलहाल, इस फैसले ने अमेरिका में ट्रांसजेंडर अधिकारों की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।


