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Thursday, April 2, 2026

आस्था के जाग्रत केंद्र:गढ़पहरा के हनुमान

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​( डॉ संदीप सबलोक- विनायक फीचर्स)

​मध्य प्रदेश के सागर जिले की ऐतिहासिक धरा पर स्थित गढ़पहरा का किला केवल पत्थरों का दुर्ग नहीं बल्कि बल्कि बुंदेलखंड के शौर्य, स्थापत्य कला और अटूट धार्मिक आस्था का जीवंत गवाह है। यहाँ की ऊँची पहाड़ियों पर विराजे हनुमान जी का प्राचीन सिद्ध मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा भी है। यह क्षेत्र प्राचीन दांगी राजाओं की राजधानी रहा है, जहाँ आज भी हवाओं में इतिहास की गूँज और फिजाओं में बजरंगबली की भक्ति घुली हुई है। यहां स्थापित मंदिर को ‘सिद्ध पीठ’ माना जाता है।
गढ़पहरा (जिसे पुराना सागर भी कहा जाता है) की विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं पर स्थित यह मंदिर अपनी ऊंचाई और भव्यता के लिए विख्यात है। मंदिर का शिखर दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। हनुमान जी की प्रतिमा अत्यंत सौम्य किंतु तेजस्वी है, जो भक्तों में निर्भयता का संचार करती है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता मंदिर की दिव्यता को और बढ़ा देती है, जहाँ प्रकृति स्वयं बजरंगबली की आरती उतारती प्रतीत होती है।
सिद्ध हनुमान मंदिर और लोक कथाएँ
​पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर विराजे प्राचीन हनुमान जी का मंदिर यहाँ की आत्मा है। इस सिद्ध पीठ की महिमा को लेकर क्षेत्र में कई पुरानी लोक कथाएँ प्रचलित हैं। बुजुर्गों की मानें तो यह मंदिर साक्षात चमत्कार का स्थल है। एक प्राचीन किंवदंती के अनुसार, दुर्ग पर आने वाले किसी भी अज्ञात संकट की सूचना हनुमान जी अदृश्य रूप में राजा को दे दिया करते थे। आज भी स्थानीय जनश्रुति है कि रात के आखिरी पहर में पहाड़ पर शंख और नगाड़ों की ध्वनि सुनाई देती है, जिसे ‘देव आरती’ माना जाता है। आषाढ़ मास में लगने वाला भव्य मेला और ‘निशान’ (ध्वजा) चढ़ाने की परंपरा इस स्थान की धार्मिक महत्ता को और भी प्रगाढ़ करती है। भक्तों का अटूट विश्वास है कि यहाँ सच्चे मन से की गई अर्जी कभी खाली नहीं जाती, यही कारण है कि इसे ‘सिद्ध पीठ’ के रूप में पूजा जाता है।

संस्कृति और श्रद्धा की अविरल धारा आषाढ़ मेला

गढ़पहरा की पहचान यहाँ आयोजित होने वाले भव्य आषाढ़ मेले से और भी प्रगाढ़ हो जाती है। वर्षा ऋतु के आगमन के साथ जब प्रकृति अपनी हरियाली की चादर ओढ़ती है, तब आषाढ़ माह में हर मंगलवार को यहाँ भक्ति का सैलाब उमड़ता है। यह मेला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बुंदेली लोक संस्कृति का दर्पण है। दूर-दराज के गाँवों से किसान अपनी नई फसल की सुख-समृद्धि की कामना लेकर ‘निशान’ (ध्वजा) चढ़ाने पैदल आते हैं। मेले में गूँजते बुंदेली भजन, फाग और ढोलक की थाप आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी जड़ों की मजबूती का अहसास कराती है।

​शौर्य का प्रतीक भी है गढ़पहरा का अभेद्य किला

​गढ़पहरा का किला बुंदेली वास्तुकला और सामरिक दूरदर्शिता का अद्भुत उदाहरण है। 11वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक दांगी शासकों का केंद्र रहा यह दुर्ग, अपनी सुरक्षा संरचना के लिए विख्यात था।माना जाता है कि उस दौरान यह क्षेत्र बुंदेलखंड की राजनीति का केंद्र था। किले के अवशेष आज भी उस काल के वैभव की कहानी सुनाते हैं। ऊँची प्राचीरें और पत्थरों पर की गई नक्काशी यह बताती है कि यह स्थान कभी राजनीतिक सत्ता का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। इतिहासकार मानते हैं कि राजा पृथ्वी सिंह के शासनकाल में इस किले ने अपनी भव्यता के चरम को छुआ था। ऐतिहासिक मान्यता है कि यहाँ के शासकों ने अपनी सुरक्षा और आध्यात्मिक शांति के लिए इस सिद्ध पीठ की स्थापना की थी। मंदिर की बनावट और यहाँ मिले अवशेष बताते हैं कि यह स्थान सदियों से तपस्वियों की साधना स्थली रहा है।

​ रहस्यमयी शीश महल

​किले के भीतर स्थित ‘शीश महल’ पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष कौतूहल का विषय है। हालाँकि समय की मार ने इसे प्रभावित किया है, लेकिन इसकी संरचना में झलकी भव्यता आज भी स्पष्ट है। इसे राजाओं के निवास और आमोद-प्रमोद के लिए बनाया गया था। महल की दीवारों पर काँच के बारीक काम और झरोखों से दिखने वाला विहंगम दृश्य इसे अद्वितीय बनाता है। यह महल उस दौर की विलासिता और कलात्मक रुचि का परिचायक है, जो आज एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में खड़ा है।

​ सामाजिक समरसता का केंद्र
धार्मिक महत्व से परे, गढ़पहरा मंदिर सामाजिक एकता का एक अनुपम उदाहरण है। यहाँ के भंडारों और मेलों में जाति, धर्म और वर्ग का भेद पूरी तरह मिट जाता है। यह स्थान सागर के लोगों के लिए केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव है, जहाँ हर मंगलवार और शनिवार को आस्था का लघु कुंभ दिखाई देता है।

​ ‘मिनी पचमढ़ी’ का भी अहसास
​वर्तमान में गढ़पहरा एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में भी उभर रहा है। वर्षा ऋतु के दौरान जब पूरी पहाड़ी हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब यहाँ का दृश्य किसी हिल स्टेशन से कम नहीं लगता। ऊँची पहाड़ियों पर स्थित होने के कारण यह ट्रेकर्स के लिए पसंदीदा स्थान है। वहीं शहर के शोर-शराबे से दूर, यह स्थान शांति और अध्यात्म की खोज करने वालों के लिए स्वर्ग समान है।
​गढ़पहरा का यह परिसर हमारी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर है। आस्था का केंद्र हनुमान मंदिर, शौर्य का प्रतीक किला और सौंदर्य का दर्पण शीश महल,ये तीनों मिलकर सागर को एक विशिष्ट पहचान देते हैं। आषाढ़ की रिमझिम फुहारों के बीच गढ़पहरा की यात्रा एक ऐसा अनुभव है, जो भक्ति और इतिहास को एक सूत्र में पिरो देता है। (विनायक फीचर्स)

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