शरद कटियार
कभी-कभी एक इंसान की जीवन यात्रा सिर्फ उसके जीने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसके जाने के बाद भी समाज को एक नई दिशा दे जाती है। गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी ऐसी ही एक प्रेरणादायक गाथा है, जो संघर्ष, साहस और मानवता के सर्वोच्च मूल्य—अंगदान—को जीवंत करती है।
तेरह वर्षों तक एक गंभीर बीमारी से जूझना कोई सामान्य बात नहीं है। यह सिर्फ शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक परीक्षा भी होती है। हरीश राणा ने इस कठिन दौर में जो धैर्य और जिजीविषा दिखाई, वह असाधारण है। जहां अधिकांश लोग परिस्थितियों के आगे टूट जाते हैं, वहीं हरीश ने हर दिन को एक नई उम्मीद के साथ जिया। उनका सपना साधारण था—एक स्वस्थ जीवन, अपने परिवार के साथ सामान्य खुशियां। लेकिन इस साधारण से सपने के पीछे असाधारण संघर्ष छिपा था।
हमारे समाज में अक्सर बीमारी को केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी के रूप में देखा जाता है, लेकिन हरीश की कहानी यह बताती है कि यह संघर्ष पूरे परिवार की सामूहिक परीक्षा बन जाता है। वर्षों तक इलाज, अस्पतालों के चक्कर, आर्थिक दबाव और भावनात्मक तनाव—इन सबके बीच भी हरीश का मुस्कुराते रहना यह दर्शाता है कि असली ताकत शरीर में नहीं, बल्कि मन में होती है।
लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक पहलू उनका अंतिम निर्णय नहीं, बल्कि उनके परिवार का वह साहसिक कदम है, जिसने इस दुखद अंत को मानवता के उत्सव में बदल दिया। अंगदान का निर्णय लेना आसान नहीं होता, खासकर उस समय जब परिवार गहरे शोक में डूबा हो। फिर भी, हरीश के परिजनों ने अपने व्यक्तिगत दुख से ऊपर उठकर समाज के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
भारत जैसे देश में, जहां अंगदान को लेकर अभी भी जागरूकता और स्वीकृति की कमी है, हरीश राणा का यह उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। हर साल हजारों लोग अंगों की कमी के कारण अपनी जान गंवा देते हैं, जबकि यदि समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़े, तो अनगिनत जीवन बचाए जा सकते हैं। हरीश के परिवार ने यह साबित कर दिया कि एक व्यक्ति का निर्णय कई जिंदगियों में रोशनी ला सकता है।
यह कहानी हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि हम जीवन को कैसे देखते हैं। क्या जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम है, या फिर दूसरों के लिए कुछ कर जाने का भी? हरीश राणा ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सच्ची महानता केवल संघर्ष में नहीं, बल्कि उस संघर्ष को दूसरों के लिए आशा में बदलने में है।
आज जब समाज में स्वार्थ और संवेदनहीनता की बातें अक्सर सुनने को मिलती हैं, ऐसे में हरीश राणा और उनके परिवार का यह निर्णय एक सकारात्मक संदेश देता है। यह हमें याद दिलाता है कि मानवता अभी भी जीवित है, और ऐसे लोग हैं जो अपने दर्द को भी दूसरों के जीवन का आधार बना सकते हैं।
हरीश राणा अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष, उनकी मुस्कान और उनका अंतिम योगदान हमेशा जीवित रहेगा। उनकी कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस विचार की है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत भी हो सकती है—किसी और के लिए, किसी और की जिंदगी में।
यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक आह्वान है—अंगदान को अपनाने का, मानवता को आगे बढ़ाने का, और यह समझने का कि हम अपने जाने के बाद भी इस दुनिया को बेहतर बना सकते हैं।
संघर्ष से सेवा तक – हरीश राणा की कहानी, जो मृत्यु के बाद भी जीवन बन गई


