गाजियाबाद।13 साल… एक लंबा समय, जिसमें दर्द भी था, उम्मीद भी थी और जीवन से जूझने की अद्भुत जिद भी। यह कहानी है हरीश राणा की, जिन्होंने जिंदगी के हर मुश्किल मोड़ पर हार नहीं मानी, लेकिन आखिरकार जब वह दुनिया से विदा हुए, तो जाते-जाते कई जिंदगियों को नई रोशनी दे गए।
हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। परिवार ने हर संभव प्रयास किया—बड़े अस्पतालों के चक्कर, महंगे इलाज, दवाइयों का अंतहीन सिलसिला—लेकिन हरीश ने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी। उनका एक ही सपना था, “मैं ठीक होकर अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जी सकूं।”
समय के साथ उनकी हालत बिगड़ती गई, लेकिन उनके हौसले में कभी कमी नहीं आई। परिवार के लोग बताते हैं कि हरीश हमेशा मुस्कुराते रहते थे और दूसरों को भी हिम्मत देते थे, मानो दर्द को उन्होंने अपनी आदत बना लिया हो।
फिर वह दिन आया, जिसने पूरे परिवार को तोड़ दिया। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया… और हरीश जिंदगी की जंग हार गए। लेकिन उनकी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
हरीश के परिवार ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने इस दुख को मानवता की सबसे बड़ी मिसाल में बदल दिया—अंगदान।
अंतिम विदाई के बीच, आंसुओं से भरी आंखों और भारी दिल के साथ परिवार ने हरीश के अंग दान करने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय से कई जरूरतमंद लोगों को नई जिंदगी मिली। किसी को नई सांसें मिलीं, किसी को फिर से देखने की रोशनी, तो किसी को जीवन का दूसरा मौका।
अंतिम यात्रा में हर किसी की आंखें नम थीं। लेकिन उन आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था—गर्व भी था। एक ऐसे इंसान पर, जिसने जिंदगी भर संघर्ष किया और मौत के बाद भी इंसानियत की मिसाल बन गया।
हरीश राणा अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका साहस, उनका संघर्ष और उनका अंतिम फैसला हमेशा जिंदा रहेगा। उनकी कहानी यह सिखाती है कि इंसान सिर्फ जीकर ही नहीं, बल्कि अपने जाने के बाद भी कई जिंदगियों को रोशन कर सकता है।
यह सिर्फ एक विदाई नहीं थी… यह मानवता की सबसे खूबसूरत कहानी थी।
13 साल का संघर्ष, अंतिम विदाई और अंगदान… हरीश राणा की कहानी जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं


