शरद कटियार
पश्चिम एशिया में तेजी से बिगड़ते हालात ने एक बार फिर वैश्विक व्यवस्था की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा 25 मार्च को सर्वदलीय बैठक बुलाना इस बात का संकेत है कि भारत इस संकट को केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना के रूप में नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे के रूप में देख रहा है।
पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव अब चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है। यह संघर्ष केवल सैन्य गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखलाओं और आर्थिक स्थिरता तक फैल चुके हैं। ऐसे में भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-निर्भर देश के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय बन जाती है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, खासतौर पर कच्चे तेल के रूप में। पश्चिम एशिया इस आपूर्ति का प्रमुख स्रोत है। यदि इस क्षेत्र में अस्थिरता बनी रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उछाल आना तय है। इसका सीधा असर देश के आम नागरिक पर पड़ेगा—पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, परिवहन लागत बढ़ेगी और अंततः महंगाई की मार हर घर तक पहुंचेगी।
लेकिन इस संकट को केवल चुनौती के रूप में देखना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यह भारत के लिए अपनी ऊर्जा नीति और कूटनीतिक रणनीति को और मजबूत करने का अवसर भी है। भारत पहले ही ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और रणनीतिक तेल भंडारण की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। अब आवश्यकता है कि इन प्रयासों को और तेज किया जाए।
केंद्र सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक लोकतंत्र की उस स्वस्थ परंपरा को दर्शाती है, जहां राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होता है और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं। ऐसे समय में जब वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हों, एकजुटता और साझा रणनीति ही देश को मजबूत बनाए रख सकती है।
भारत के सामने इस समय तीन बड़ी चुनौतियां हैं—ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना, महंगाई को नियंत्रण में रखना और अंतरराष्ट्रीय मंच पर संतुलित कूटनीतिक संबंध बनाए रखना। खासतौर पर पश्चिम एशिया में भारत के सभी देशों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध हैं, ऐसे में किसी एक पक्ष की ओर झुकाव से बचते हुए संतुलन बनाए रखना एक कठिन लेकिन आवश्यक कार्य है।
इस संकट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक परिदृश्य में अनिश्चितता अब एक स्थायी तत्व बन चुकी है। ऐसे में भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में अपने प्रयासों को और तेज करना होगा—चाहे वह ऊर्जा के क्षेत्र में हो, तकनीक में या आर्थिक ढांचे में।
अंततः, 25 मार्च की सर्वदलीय बैठक केवल एक औपचारिक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक रणनीतिक पहल है, जो यह दर्शाती है कि भारत आने वाले समय की चुनौतियों के प्रति सजग है और उन्हें सामूहिक बुद्धिमत्ता के साथ संभालने के लिए तैयार है। यदि इस बैठक से ठोस और दूरदर्शी नीतिगत दिशा निकलती है, तो यह न केवल मौजूदा संकट से निपटने में सहायक होगी, बल्कि भारत की वैश्विक स्थिति को भी और सुदृढ़ बनाएगी।


