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Friday, May 22, 2026

धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: SC दर्जा तुरंत खत्म, एससी-एसटी एक्ट का लाभ नहीं मिलेगा

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम और स्पष्ट संदेश देने वाला फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा खो देता है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह साफ कर दिया कि संविधान के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में आ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सांविधानिक आदेश, 1950 में साफ कहा गया है कि खंड-3 का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति इन तीन धर्मों के अलावा किसी अन्य धर्म—जैसे ईसाई या मुस्लिम—को अपनाता है, तो उसका SC दर्जा जन्म के बावजूद स्वतः समाप्त हो जाता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रावधान बिल्कुल स्पष्ट और बाध्यकारी है।
यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और पिछले एक दशक से पादरी (पेस्टर) के रूप में कार्य कर रहा था। उसने कुछ लोगों के खिलाफ Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था और कानून के तहत संरक्षण की मांग की थी। हालांकि आरोपियों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि शिकायतकर्ता अब ईसाई धर्म अपना चुका है, इसलिए वह इस कानून के तहत मिलने वाले संरक्षण का हकदार नहीं है।
इससे पहले 30 अप्रैल 2025 को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था का अस्तित्व नहीं है, इसलिए धर्म परिवर्तन करने के बाद संबंधित व्यक्ति एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों का लाभ नहीं ले सकता। हाईकोर्ट ने मामले में एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को हटाने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि व्यक्ति अपने मूल धर्म में वापस लौटा या नहीं, बल्कि यह देखा जाएगा कि घटना के समय वह किस धर्म का पालन कर रहा था। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता लंबे समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहा था और नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि घटना के समय वह ईसाई ही था।
अपने इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति से जुड़े संवैधानिक लाभ और कानूनी संरक्षण स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।

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