भरत चतुर्वेदी
मानव जीवन, समाज और राजनीति—तीनों के इतिहास में एक बात बार-बार सिद्ध हुई है कि स्थायी न मित्र होता है, न शत्रु। परिस्थितियाँ, स्वार्थ और समय ही तय करते हैं कि कौन किसका साथ देगा। यही कारण है कि अक्सर देखने में आता है कि जो कल तक कट्टर विरोधी थे, आज साथ खड़े नजर आते हैं।
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति होती है। दरअसल, जब किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल का कोई विशेष उद्देश्य होता है, तब वह अपने पुराने मतभेदों को किनारे रखकर अपने विरोधी से भी हाथ मिला लेता है।
स्वार्थ और उद्देश्य की राजनीति
राजनीति में यह प्रवृत्ति सबसे अधिक देखने को मिलती है। चुनाव के समय कई ऐसे गठबंधन बनते हैं जो सामान्य परिस्थितियों में असंभव लगते हैं। लेकिन सत्ता प्राप्ति या किसी विरोधी को हराने के लिए पुराने शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। यह मित्रता भावनात्मक नहीं, बल्कि पूरी तरह लाभ और लक्ष्य आधारित होती है।
यह केवल राजनीति तक सीमित नहीं है। व्यक्तिगत जीवन में भी कई बार लोग अपने स्वार्थ या आवश्यकता के अनुसार रिश्तों को बदलते हैं। जब तक उद्देश्य पूरा नहीं होता, तब तक मधुरता बनी रहती है, और जैसे ही लक्ष्य पूरा होता है, संबंधों में दूरी आ जाती है।
रणनीति या मजबूरी?
कई बार यह सवाल उठता है कि क्या यह केवल स्वार्थ है या समय की मजबूरी? सच यह है कि दोनों ही बातें इसमें शामिल होती हैं। परिस्थितियाँ व्यक्ति को ऐसे निर्णय लेने के लिए बाध्य कर देती हैं, जहाँ उसे अपने पुराने विरोध को भुलाकर आगे बढ़ना पड़ता है।
ऐसे रिश्तों में विश्वास हमेशा सीमित रखना चाहिए, क्योंकि यह मित्रता स्थायी नहीं होती। यह केवल तब तक रहती है, जब तक दोनों पक्षों का उद्देश्य एक जैसा होता है।
“किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है” — यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का कठोर सत्य है। इसलिए व्यक्ति को परिस्थितियों को समझते हुए ही संबंधों का मूल्यांकन करना चाहिए और भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेना चाहिए।
किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है


