इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति के निजी परिसर में नमाज या अन्य धार्मिक आयोजनों पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार देता है, और यह अधिकार सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने संभल निवासी मुनाजिर खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। याचिका में प्रशासन द्वारा एक स्थल पर नमाजियों की संख्या सीमित करने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पहले भी कड़ी नाराजगी जताई थी और कहा था कि यदि जिला प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं है तो संबंधित अधिकारी पद छोड़ दें या स्थानांतरण करवा लें। याची की ओर से बताया गया कि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देकर नमाजियों की संख्या 20 तक सीमित कर दी थी, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी निजी स्थान पर शांतिपूर्ण ढंग से प्रार्थना की जा रही है, तो उसे रोका नहीं जा सकता। यदि इस पर कोई व्यक्ति या समूह आपत्ति करता है, तो प्रशासन का दायित्व है कि वह स्थिति का संज्ञान लेकर आवश्यकतानुसार सुरक्षा उपलब्ध कराए। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर उचित और सीमित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन यह अधिकार पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता ने उस भूमि को मस्जिद बताते हुए वहां नमाज अदा करने की अनुमति मांगी थी, जिसे उनके दादा ने वर्ष 1995 में धार्मिक उपयोग के लिए समर्पित किया था। अदालत ने वर्तमान स्थिति में उस संरचना को मस्जिद के रूप में मान्यता नहीं दी, लेकिन यह माना कि वहां पहले से नमाज अदा की जाती रही है, इसलिए श्रद्धालुओं को प्रार्थना से नहीं रोका जाना चाहिए।
अदालत ने अपने फैसले में ‘मैरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश’ मामले का भी हवाला दिया और दोहराया कि निजी संपत्तियों में धार्मिक गतिविधियों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता की सराहना करते हुए कहा कि देश की ताकत सहनशीलता और आपसी सम्मान में निहित है।
साथ ही यह भी कहा गया कि अनुच्छेद-25 केवल आस्तिकों के लिए ही नहीं, बल्कि नास्तिकों को भी अपने विचार व्यक्त करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को भेजी जाए, ताकि इसे प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।
सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि याची ने यह स्पष्ट नहीं किया कि नमाजियों की संख्या सीमित करने का आदेश किसने जारी किया था, जिस पर कोर्ट ने विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने को कहा है।


