– मजबूरी में बदली तेल नीति!
नई दिल्ली | यूथ इंडिया | विशेष रिपोर्ट: भारत और ईरान के बीच कभी ऊर्जा सहयोग की मजबूत साझेदारी थी। ईरान भारत को सस्ता कच्चा तेल देता था, भुगतान की आसान व्यवस्था थी और शिपिंग तक में रियायत मिलती थी। लेकिन वैश्विक राजनीति के दबाव, खासकर अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति में बदलाव आर्थिक कारणों से कम और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अधिक करना पड़ा।
कई वर्षों तक ईरान भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा। भारत को वहां से अंतरराष्ट्रीय बाजार से 2 से 5 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता तेल मिलता था। भुगतान व्यवस्था भी भारत के लिए सुविधाजनक थी। भारत ईरान को तेल का भुगतान रुपये में करता था और इसके लिए यूको बैंक की कोलकाता शाखा में विशेष खाता संचालित किया जाता था।
इस व्यवस्था से भारत की विदेशी मुद्रा बचती थी और ईरान उस रुपये से भारत से चावल, चाय, दवाइयां और अन्य सामान खरीदता था।
ईरान कई बार अपने टैंकरों से भारत को तेल भेजता था। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के समय जहाजों का बीमा भी ईरान खुद करता था। इससे भारत की आयात लागत कम हो जाती थी और ऊर्जा आपूर्ति स्थिर बनी रहती थी। 2018 में अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प थे। अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिया कि जो देश ईरान से तेल खरीदना जारी रखेंगे, उनके बैंक और कंपनियों पर भी आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील थी, क्योंकि अमेरिका के साथ उसका व्यापार, निवेश और रक्षा सहयोग अरबों डॉलर का है। ऐसे में भारत के लिए अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से टकराव का जोखिम उठाना संभव नहीं था। इन परिस्थितियों के चलते भारत ने 2019 में ईरान से कच्चे तेल का आयात लगभग बंद कर दिया। इसके बाद भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए नए स्रोत तलाशने पड़े।भारत ने इसके बाद रसिया , इराक और सऊदी अरबिया जैसे देशों से तेल आयात बढ़ा दिया।
रणनीतिक रिश्ते अभी भी कायम
हालांकि तेल व्यापार लगभग बंद हो गया, लेकिन भारत और ईरान के बीच रणनीतिक संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।
दोनों देश अभी भी चाबहार पोर्ट परियोजना पर सहयोग कर रहे हैं, जिसे भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है।
भारत और ईरान के बीच ऊर्जा सहयोग आर्थिक रूप से लाभकारी था। लेकिन वैश्विक राजनीति और अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव ने भारत को अपनी नीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया। तेल केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति का भी बड़ा हथियार है।


