दिग्गजों की हार ने नेताओं को दिया सख्त संदेश, जमीन पर उतरें वरना घर बैठें
यूथ इंडिया (प्रशांत कटियार)
चुनावी नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता से बड़ा कोई नहीं। सत्ता के गलियारों में बैठकर खुद को अजेय समझने वाले कई बड़े चेहरे इस बार धराशायी हो गए। यह सिर्फ हार नहीं है बल्कि उन नेताओं के लिए करारा तमाचा है जो जनता से दूर होकर केवल भाषणों और छवि की राजनीति में उलझ गए थे।
गौरव गोगोई की हार हो, एम.के. स्टालिन का गढ़ ढहना हो या ममता बनर्जी जैसी मजबूत नेता का पराजित होना इन सबमें एक समान संदेश छिपा है: जनता अब दिखावे से नहीं, काम से प्रभावित होती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद नेताओं में जो आत्मसंतोष और अहंकार आ जाता है, उसे इस बार मतदाताओं ने साफ तौर पर खारिज कर दिया।
आज का मतदाता पहले से ज्यादा जागरूक है। उसे न जाति के नाम पर बरगलाया जा सकता है, न बड़े बड़े वादों से बहलाया जा सकता है।
यह हार उन नेताओं के लिए चेतावनी है जो चुनाव के समय ही गांव गांव नजर आते हैं और जीत के बाद जनता से दूरी बना लेते हैं। अब राजनीति एसी कमरों और सोशल मीडिया के प्रचार से नहीं चलेगी। नेताओं को जमीन पर उतरना होगा, लोगों के बीच जाना होगा, उनकी समस्याएं सुननी होंगी और उनका समाधान करना होगा। वरना जनता देर नहीं करती वह सीधे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा देती है।लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन वह मुद्दों पर होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत हमलों और कटुता पर। राजनीति अगर केवल आरोप प्रत्यारोप तक सीमित रहेगी, तो जनता ऐसे ही सबक सिखाती रहेगी। अब समय आ गया है कि नेता अपनी प्राथमिकताएं तय करें जनता की सेवा या सिर्फ कुर्सी की राजनीति।
साफ है कि, जनता जनार्दन है जिसको हल्के में लेना अब किसी भी नेता के लिए भारी पड़ सकता है। जो जमीन से जुड़ा रहेगा, वही टिकेगा। जो अहंकार में रहेगा, उसका राजनीतिक अंत तय है।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के स्टेट हेड हैं।)
जनता ने तोड़ा घमंड


