– भारत की ऊर्जा राजनीति की पूरी कहानी
शरद कटियार
नई दिल्ली। भारत की ऊर्जा नीति पिछले एक दशक में बड़े बदलावों से गुज़री है। कभी Iran भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता था, जहां से भारत को सस्ता तेल, आसान भुगतान और ट्रांसपोर्ट में विशेष छूट मिलती थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति, विशेष रूप से अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को यह व्यवस्था छोड़नी पड़ी। इसके बाद वैश्विक ऊर्जा समीकरण बदले और रूस भारत का बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा।
यह पूरी कहानी केवल व्यापार की नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, कूटनीति और आर्थिक मजबूरियों की भी है।
भारत और ईरान के बीच तेल व्यापार लंबे समय तक दोनों देशों के लिए फायदेमंद रहा। ईरान भारत को अक्सर अंतरराष्ट्रीय बाजार से 2 से 5 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता तेल देता था। इसके अलावा भुगतान की शर्तें भी आसान थीं। भारत को कई बार 60 से 90 दिन का क्रेडिट मिलता था।
तेल भुगतान के लिए भारत ने एक विशेष व्यवस्था बनाई थी, जिसमें यूको बैंक की कोलकाता शाखा में ईरान का रुपया खाता खोला गया था। भारत ईरान से खरीदे गए तेल का भुगतान रुपये में करता था और उस पैसे से ईरान भारत से दवाइयां, चावल, चाय और अन्य सामान खरीद सकता था। इस व्यवस्था से भारत को डॉलर खर्च करने की जरूरत कम पड़ती थी और भारतीय निर्यातकों को भी बड़ा बाजार मिलता था।
ईरान भारत को शिपिंग और बीमा में भी राहत देता था। कई बार ईरान अपने टैंकर से तेल भेजता था और जहाजों का बीमा भी खुद ही करता था। इससे भारत की आयात लागत और कम हो जाती थी। 2018 में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तब वैश्विक बैंकिंग और व्यापार व्यवस्था पर उसका असर पड़ा।
अमेरिका ने साफ संकेत दिया कि जो देश ईरान से तेल खरीदते रहेंगे, उन पर भी आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इससे भारतीय बैंकिंग प्रणाली और कंपनियों के लिए जोखिम पैदा हो गया। भारत का अमेरिका के साथ व्यापार, तकनीक और रक्षा सहयोग काफी बड़ा है। इसलिए भारत ने 2019 में ईरान से तेल आयात लगभग बंद कर दिया।
इसी बीच वैश्विक राजनीति में एक और बड़ा बदलाव हुआ। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर भी प्रतिबंध लगा दिए। रूस को अपने तेल के लिए नए बाजारों की जरूरत थी। ऐसे में भारत और चीन उसके सबसे बड़े खरीदार बनकर सामने आए।
रूस ने भारत को भारी छूट पर तेल देना शुरू किया। कई बार यह छूट 20 से 30 डॉलर प्रति बैरल तक बताई गई। इसका फायदा भारत की रिफाइनरियों को मिला और रूस कुछ महीनों में भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।
आज भारत अपनी ऊर्जा जरूरतें कई देशों से पूरी कर रहा है। प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में रूस,इराक,सऊदी अरबिया,
यूनाइटेड स्टेट्स,शामिल हैं।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल विदेशों से आयात करता है। इसलिए भारत को हमेशा अंतरराष्ट्रीय राजनीति और बाजार दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से तेल खरीद भारत के लिए आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद थी। लेकिन वैश्विक राजनीतिक दबाव और वित्तीय जोखिमों के कारण भारत को अपनी नीति बदलनी पड़ी।
आज भारत ने एक नई रणनीति अपनाई है—एक ही देश पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों से तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना। ईरान से तेल व्यापार बंद होना केवल आर्थिक फैसला नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की मजबूरी भी थी। इसके बाद रूस को नया बाजार मिला और भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति बदलकर नए स्रोत तलाशे।यह पूरी कहानी दिखाती है कि तेल केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति और कूटनीति का भी बड़ा हथियार है।


