
(डॉ. सुधाकर आशावादी-विनायक फीचर्स)
अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम पूरे विश्व को प्रभावित करते हैं। युद्ध विभीषिका की आंच अंतर्राष्ट्रीय मैत्री संबंधों पर भी पड़ती है। प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए विदेश नीति निर्धारित करता है, जिसका समर्थन प्रत्येक नागरिक द्वारा किया जाना अपेक्षित होता है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक भी है, कि प्रत्येक राजनीतिक दल व प्रत्येक नागरिक सभी प्रकार के मतभेद भुलाकर राष्ट्र की नीतियों का स्वागत करें तथा युद्ध विभीषिका के प्रभाव को रोकने के लिए राष्ट्र के साथ दृढ़ता से खड़ा रहें। भारत का दुर्भाग्य है, कि संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के कारण सत्ता से बेदखल किये गए राजनीतिक दल सरकार को बदनाम करने और देश में अराजकता फ़ैलाने का कोई अवसर भी चूकना नहीं चाहते। वे सरकार का साथ देने की बजाय सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करते रहते हैं तथा अपने शासनकाल की अव्यवस्थाओं को भूलकर अफवाह फ़ैलाने में जुटे रहते हैं। इजराइल अमेरिका व ईरान युद्ध में पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति में आए व्यवधान को देश का विपक्ष आपदा में अवसर समझकर सरकार को घेरने में लगा है। यदि ऐसा न होता, तो यकायक एलपीजी गैस सिलेंडरों की कमी की अफवाह फैलाकर लोगों को गैस एजेंसियों के बाहर कतार में न खड़ा कराया जाता। विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक सरकार विरोधी विमर्श का प्रसार न करता। जिन राजनेताओं को अपने घर की रसोई की व्यवस्था से कोई सरोकार नहीं,, वे भी सड़क पर न उतरते। बहरहाल मुद्दा सिर्फ पेट्रोलियम पदार्थों व गैस की किल्लत को बढ़ा चढ़ा कर जनता को भ्रमित करने तक सीमित नहीं है। विचारणीय बिंदु यह भी है कि अपनी राजनीतिक धरती खो चुकी कांग्रेस जनहित के मुद्दों पर कितनी गंभीर है? यह सर्वविदित है, यदि जनहित के मुद्दों से कांग्रेस को सरोकार होता, तो इसकी दोमुंहेपन की नीतियों के कारण इसे बार बार पराजय का सामना नहीं करना पड़ता। बार बार अविश्वास प्रस्ताव लाने के उपरांत भी इसे मुंह की न खानी पड़ती। मुद्दा केवल यह है, कि जब एकजुट होकर अप्रत्याशित आपदा का सामना करने का समय हो, उस समय विपक्ष द्वारा देश में अराजकता का वातावरण बनाने का प्रयास किया जाना कितना उचित है ? (विनायक फीचर्स)


