देश की राजनीति में कई बार ऐसे प्रतीक सामने आते हैं जो सीधे जनता के दर्द और संघर्ष को अभिव्यक्त करते हैं। संसद परिसर में हाथों में आलू लेकर विरोध प्रदर्शन करना भी ऐसा ही एक प्रतीकात्मक कदम है। समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव और सांसद धर्मेंद्र यादव ने जब आलू हाथ में लेकर किसानों की समस्या उठाई, तो यह केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि उस किसान की आवाज थी जिसकी मेहनत का उचित मूल्य आज भी अनिश्चितताओं में उलझा हुआ है।
उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में आलू की खेती लाखों किसानों की आजीविका का मुख्य आधार है। खेत में महीनों की मेहनत, खाद-बीज की बढ़ती लागत, सिंचाई का खर्च और मौसम की मार झेलने के बाद जब किसान अपनी फसल मंडी तक पहुंचाता है, तब उसे उम्मीद होती है कि उसे उसकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई बार किसानों को लागत से भी कम कीमत पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
आलू किसानों की समस्या नई नहीं है। हर वर्ष उत्पादन बढ़ने के साथ ही बाजार में कीमतें गिर जाती हैं और किसान आर्थिक संकट में घिर जाता है। कई बार तो हालात ऐसे हो जाते हैं कि किसान आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखने का खर्च भी नहीं निकाल पाता। यही कारण है कि कई किसान अपनी फसल सड़ने के लिए छोड़ देते हैं या बेहद कम कीमत पर बेच देते हैं।
यह समस्या केवल बाजार की नहीं बल्कि नीति और व्यवस्था की भी है। गेहूं और धान जैसी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी ) की व्यवस्था तो है, लेकिन आलू और अन्य सब्जी फसलों के लिए ऐसी ठोस सुरक्षा व्यवस्था अभी तक पूरी तरह प्रभावी नहीं बन पाई है। परिणामस्वरूप किसान बाजार के उतार-चढ़ाव के भरोसे रह जाता है।
संसद में उठी यह आवाज इस बात का संकेत है कि किसानों की समस्या अब राजनीतिक विमर्श का भी महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। विपक्ष का यह विरोध सरकार को यह याद दिलाने का प्रयास है कि खेती केवल उत्पादन का विषय नहीं बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का प्रश्न भी है।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि केवल प्रतीकात्मक विरोध से किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। इसके लिए ठोस नीतिगत कदमों की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि आलू और अन्य सब्जी फसलों के लिए बेहतर भंडारण व्यवस्था, प्रसंस्करण उद्योग, निर्यात के अवसर और उचित मूल्य सुनिश्चित करने वाली नीति विकसित करे।
इसके साथ ही मंडियों की व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनाना भी जरूरी है, ताकि किसान को बिचौलियों पर निर्भर न रहना पड़े। यदि किसान को सीधे बाजार और उपभोक्ता तक पहुंचने का अवसर मिलेगा तो उसकी आय में भी वृद्धि होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि किसानों की आवाज केवल संसद के गलियारों तक सीमित न रह जाए, बल्कि नीति निर्माण के केंद्र में पहुंचे। देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा का आधार किसान ही है। यदि किसान मजबूत होगा तो कृषि भी मजबूत होगी और देश की आर्थिक संरचना भी अधिक स्थिर बनेगी।
आलू हाथ में लेकर किया गया यह विरोध एक प्रतीक है—उस किसान की पीड़ा का, जो अपनी मेहनत का उचित मूल्य चाहता है। अब देखना यह है कि यह आवाज केवल राजनीतिक बहस बनकर रह जाती है या फिर वास्तव में किसानों के हित में ठोस कदम उठाने का रास्ता तैयार करती है।
आलू की आवाज संसद तक: क्या किसानों को मिलेगा उनकी मेहनत का सही मूल्य?


