बीजिंग। वैश्विक तनाव और ईरान से जुड़े ताजा घटनाक्रमों के बीच अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार चीन ऐसी रणनीति पर काम कर रहा है जिसके जरिए वह बिना युद्ध और बिना गोली चलाए अमेरिका की उन्नत सैन्य क्षमताओं को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की यह रणनीति मुख्य रूप से उन महत्वपूर्ण कच्चे संसाधनों और तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण मजबूत करने से जुड़ी है, जिनके बिना आधुनिक सैन्य उपकरणों का निर्माण संभव नहीं है।
इन संसाधनों में सबसे अहम रेयर अर्थ खनिज हैं, जिनका इस्तेमाल अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों में व्यापक रूप से किया जाता है। अमेरिका के प्रसिद्ध एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट सहित कई आधुनिक हथियारों में इन धातुओं की बड़ी भूमिका होती है।
रेयर अर्थ धातुएं जेट इंजन, सेंसर, रडार सिस्टम, गाइडेड मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों के निर्माण में उपयोग की जाती हैं। इनकी आपूर्ति बाधित होने पर रक्षा उत्पादन की गति पर सीधा असर पड़ सकता है।
रिपोर्टों के अनुसार चीन पहले से ही दुनिया में रेयर अर्थ खनिजों की प्रोसेसिंग का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है। इसी कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखला में उसकी स्थिति बेहद मजबूत मानी जाती है।
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इन खनिजों के निर्यात पर कई कड़े नियम लागू किए हैं। माना जा रहा है कि इसका उद्देश्य अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखना और वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनाए रखना है।
विश्लेषकों के अनुसार चीन की नई औद्योगिक और तकनीकी योजनाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ-साथ रेयर अर्थ संसाधनों पर नियंत्रण मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है।
इस रणनीति का असर केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक तकनीकी उद्योग, सेमीकंडक्टर निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन को भी प्रभावित कर सकता है।
दूसरी ओर अमेरिका भी इस संभावित खतरे से पूरी तरह वाकिफ है। अमेरिकी सरकार ने 2027 तक रक्षा क्षेत्र में चीनी रेयर अर्थ खनिजों पर अपनी निर्भरता कम करने की योजना तैयार की है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि नई खदानों का विकास करना और इन खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाना आसान नहीं है। इसके लिए भारी निवेश और कई वर्षों का समय लग सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल हथियारों की ताकत से तय नहीं होगी, बल्कि संसाधनों, तकनीक और आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण भी वैश्विक शक्ति संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाएगा।


