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Tuesday, March 10, 2026

युद्ध की विभीषिका: हारती मानवता और सिसकता विश्व।

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-सुनील कुमार महला

युद्ध वास्तव में केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि उसका सबसे गहरा घाव मानवता की आत्मा पर लगता है। कहना गलत नहीं होगा कि आज का विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ प्रगति की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन धरातल पर विनाश की पदचाप साफ़ सुनाई देती है। पिछले कुछ समय से अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को अनिश्चितता के भंवर में धकेल दिया है। सच तो यह है कि इस संघर्ष के कारण चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है और तबाही का मंजर करीब आता दिखाई दे रहा है। यह संघर्ष केवल दो-तीन देशों की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, मानवीय संवेदनाओं और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी पड़ रहा है।

युद्ध और आर्थिक तबाही:-

यह एक कड़वा सच है कि युद्ध का सबसे पहला और प्रत्यक्ष प्रहार आम आदमी की जेब और पेट पर होता है। मध्य-पूर्व दुनिया के तेल और गैस का प्रमुख केंद्र है। जब भी यहाँ युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) बाधित हो जाती है। तेल और गैस की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि महंगाई को चरम पर पहुँचा देती है। एक गरीब परिवार के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी कठिन हो जाता है, क्योंकि युद्ध के कारण परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। यह आर्थिक संकट केवल एक देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे विश्व के लिए साझा संकट बन जाता है।

अहम और विस्तारवाद की अंधी दौड़:-

युद्ध कभी भी अचानक नहीं होते; इनके पीछे लंबे समय से पल रही कुंठाएँ, विस्तारवादी नीतियाँ और शासकों की मनमानी होती है। जब देशों के बीच संवाद समाप्त हो जाता है और ‘अहम’ (इगो) बड़ा हो जाता है, तब कूटनीति के रास्ते बंद हो जाते हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज परमाणु हथियारों की होड़ ने मानव जाति को विनाश के उस मुहाने पर खड़ा कर दिया है जहाँ एक छोटी-सी गलती पूरी सभ्यता को मिटा सकती है। धार्मिक कट्टरवाद, जातीय संघर्ष और सीमा विवाद जैसे मुद्दे आग में घी डालने का काम करते हैं। जब शासक अपनी शक्ति के प्रदर्शन में अंधे हो जाते हैं, तो वे यह भूल जाते हैं कि जिस धरती को जीतने की कोशिश कर रहे हैं, उसे रहने लायक भी नहीं छोड़ेंगे।

युद्ध: इंसानियत की हार:-

इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं रहे। युद्ध केवल नए युद्धों का बीज बोते हैं। किसी भी संघर्ष में न कोई देश वास्तव में जीतता है और न ही कोई हारता है; अगर कुछ हारता है तो वह है मानवता।

सच तो यह है कि युद्ध के मैदान में बारूद की गंध के बीच सबसे पहले करुणा और दया की बलि चढ़ती है। जब बम गिरते हैं, तो वे यह नहीं देखते कि नीचे कौन है। मलबे के ढेर पर बैठकर बिलखते बच्चे, अपनों को खो चुकी महिलाएँ और बेबस बुजुर्ग इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि युद्ध कितना क्रूर होता है। जो बच्चे आज खिलौनों से खेलना चाहते हैं, उनके हाथों में युद्ध ने नफरत और विनाश की यादें थमा दी हैं। जिस देश को बनाने में दशकों का पसीना और मेहनत लगती है, युद्ध उसे कुछ ही दिनों में खंडहर बना देता है और देश बरसों पीछे चला जाता है।

युद्धग्रस्त देशों की भयावह स्थिति:-

यह विचारणीय है कि दुनिया के कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने युद्धरत देशों से युद्धविराम की अपील की है, लेकिन शासकों की जिद के कारण दुनिया असहाय दिखाई दे रही है। इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं और इसकी प्रासंगिकता को लेकर बहस तेज हो गई है। दूसरी ओर युद्धग्रस्त देशों की स्थिति बेहद भयावह है। लगातार बमबारी के कारण बड़े-बड़े शहर खंडहर में बदल चुके हैं। सड़कों पर जगह-जगह लाशें बिखरी पड़ी हैं और अस्पतालों में घायल मासूम बच्चों की दर्दनाक तस्वीरें दिल दहला देती हैं। चारों ओर आग और धुएँ का वातावरण है। एंबुलेंस और हवाई हमलों के सायरन हर पल खामोशी को चीरते रहते हैं। अस्पतालों, स्कूलों, थिएटरों और रिहायशी इलाकों पर बमबारी के बाद जान बचाने के लिए सड़कों पर भागती भीड़ का दृश्य अत्यंत पीड़ादायक है। पानी, दूध, ब्रेड और दवाइयों के लिए परेशान महिलाओं और बुजुर्गों की भीड़ मानवता को शर्मसार करती है और युद्धरत देशों के शासकों की संवेदनहीनता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

शरणार्थियों की त्रासदी:-

इतिहास यह भी बताता है कि युद्ध में किसी की वास्तविक जीत नहीं होती, बल्कि हार हमेशा मानवता की होती है। विश्व युद्धों से लेकर विभिन्न देशों के बीच हुए संघर्षों ने यह सिद्ध किया है कि युद्ध की भयावहता का प्रभाव आने वाली कई पीढ़ियों तक बना रहता है।इन युद्धों में उन निर्दोष युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की जान जाती है, जिनका इस लड़ाई की जीत या हार से कोई संबंध नहीं होता। युद्ध के कारण शरणार्थियों की समस्या भी पैदा होती है। लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर हो जाते हैं। वहाँ उनका जीवन अक्सर दोयम दर्जे के नागरिक जैसा हो जाता है और उन्हें रोटी, कपड़ा तथा सिर पर छत के लिए भी प्रशासन की मदद पर निर्भर रहना पड़ता है। शरणार्थियों की यह समस्या कई देशों के लिए आर्थिक बोझ भी बनती है और कई बार सामाजिक तनाव का कारण भी बन जाती है।

निष्कर्ष:-

अंत में यही कहूंगा कि युद्ध विकास का अंत और विनाश का प्रारंभ है। नशीले पदार्थों का अवैध व्यापार, संसाधनों पर कब्जे की होड़ और धार्मिक कट्टरता-ये सभी समाज को खोखला करने वाले तत्व हैं, जो अंततः युद्ध का रूप ले लेते हैं।आज समय की मांग है कि विश्व के नेतृत्वकर्ता अपने निजी स्वार्थों और झूठी शान को त्यागकर शांति के मार्ग पर चलें। हमें यह समझना होगा कि धरती पर संसाधनों की कमी नहीं है; कमी है तो केवल इंसानियत और आपसी समझ की। यदि आज हम नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियों के पास इतिहास पढ़ने के लिए पन्ने तो होंगे, लेकिन रहने के लिए सुरक्षित दुनिया नहीं होगी। अंततः यही कहा जा सकता है कि शांति ही एकमात्र विकल्प है। दुनिया के शासकों को इतिहास से सबक लेने की आवश्यकता है, क्योंकि युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं करता; यह केवल विनाश और पीड़ा ही लाता है। आज के वैश्विक माहौल में दुनिया को युद्ध नहीं, बल्कि अहिंसा और शांति के उस मार्ग को अपनाने की आवश्यकता है जिसे गौतम बुद्ध और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने मानवता के लिए दिखाया था। वास्तव में तभी मानवता की रक्षा संभव है।

 

सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।

मोबाइल 9828108858

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