भरत चतुर्वेदी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जीत का कोई भी समीकरण स्थायी नहीं रहा है। हर चुनाव में नए सामाजिक और जातीय समीकरण बनते हैं और पुराने टूट जाते हैं। इसी बदलते राजनीतिक माहौल के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए फिर से “पीडीए फॉर्मूला” यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
हालांकि इस बार उनकी राजनीति में एक नया प्रयोग भी दिखाई दे रहा है। सपा नेतृत्व अब केवल पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अगड़ी जातियों के एक हिस्से को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। माना जा रहा है कि यह रणनीति भारतीय जनता पार्टी के मजबूत सामाजिक गठबंधन को चुनौती देने के उद्देश्य से तैयार की जा रही है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देखने को मिला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने प्रदेश की राजनीति का समीकरण ही बदल दिया। 2014 के चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगियों ने 80 में से 73 सीटें जीतकर रिकॉर्ड प्रदर्शन किया। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा गठबंधन ने 64 सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी।
वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 में से 255 सीटें जीतकर दोबारा सरकार बनाई, जिससे साफ हो गया कि भाजपा का सामाजिक गठबंधन प्रदेश में काफी मजबूत हो चुका है। भाजपा ने पिछड़ा, दलित और अगड़ी जातियों के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़कर एक व्यापक वोट बैंक तैयार किया है।
इसके पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी माय (मुस्लिम + यादव) समीकरण के सहारे मजबूत स्थिति में रहती थी। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में इसी समीकरण के दम पर समाजवादी पार्टी को 224 सीटें मिली थीं और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने थे। उस समय मुस्लिम और यादव वोट बैंक के साथ अन्य पिछड़ी जातियों का समर्थन भी सपा के साथ रहा।
लेकिन 2014 के बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले। भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ों, गैर-जाटव दलितों और अगड़ी जातियों को एक साथ जोड़कर नया सामाजिक समीकरण खड़ा कर दिया, जिससे सपा और बसपा दोनों की पारंपरिक राजनीति को बड़ा झटका लगा।
अब 2027 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की नई सामाजिक एकता पर जोर दे रहे हैं। उनका मानना है कि यदि इन वर्गों का वोट एकजुट होता है तो प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाला चुनाव भी साबित हो सकता है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने स्तर पर नए समीकरण बनाने और पुराने वोट बैंक को मजबूत करने में जुट गए हैं।
यूपी 2027 : पीडीए के सहारे सत्ता की राह तलाश रहे अखिलेश यादव


