शरद कटियार
मैनपुरी के वेवर थाना क्षेत्र स्थित गांव नवीगंज में वर्ष 2005 में हुए दोहरे हत्याकांड की फाइल एक बार फिर खुल गई है। अदालत के आदेश के बाद पुनर्विवेचना शुरू होने जा रही है। यह केवल एक आपराधिक मामले की कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता की कसौटी भी है।
6 अगस्त 2005 को कौशल किशोर दुबे और उनकी पत्नी कृष्णा देवी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना। कई लोगों को नामजद किया गया, जिनमें चर्चित नाम भी शामिल थे। जांच चली, लेकिन 5 फरवरी 2006 को पर्याप्त साक्ष्य न मिलने का हवाला देते हुए अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई और मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।
करीब दो दशक बाद मृतक दंपति की बेटी राधिका (पत्नी सौरभ मिश्रा) ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि घटना के समय वे और उनके भाई-बहन नाबालिग थे, इसलिए न्याय के लिए संघर्ष करने की स्थिति में नहीं थे। वयस्क होने के बाद उन्होंने पुनः जांच की मांग की।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मैनपुरी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुनर्विवेचना की अनुमति दी। अदालत की यह टिप्पणी कि “अपराध कभी समाप्त नहीं होता और सत्य की खोज के लिए जांच अधिकारी स्वतंत्र है” न्यायिक संवेदनशीलता को दर्शाती है। यह संदेश भी देती है कि समय बीत जाने से न्याय की आवश्यकता समाप्त नहीं होती।
यह भी एक तथ्य है कि शुरुआती जांच के दौरान प्रभाव और दबाव जैसे सवाल उठते रहे। हालांकि उस समय की अंतिम रिपोर्ट अदालत ने स्वीकार कर ली थी, लेकिन अब पुनः जांच का अवसर इस बात की परीक्षा है कि क्या नई परिस्थितियों, तकनीकी साक्ष्यों और बदले सामाजिक वातावरण में सच्चाई सामने आ सकेगी।
आज इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, डिजिटल रिकॉर्ड, आर्थिक लेन-देन की ट्रैकिंग जैसी तकनीकें जांच एजेंसियों के पास उपलब्ध हैं। ऐसे में यदि कहीं कोई तथ्य छूटा था, तो उसके सामने आने की संभावना अधिक है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष, साक्ष्य-आधारित और कानूनी दायरे में रहे।
वर्तमान में इस प्रकरण से जुड़े एक आरोपी अनुराग दुबे उर्फ डब्बन गैंगस्टर एक्ट के तहत जेल में बंद हैं। पुनर्विवेचना के आदेश के बाद बी-वारंट की प्रक्रिया और अन्य कानूनी कदम संभावित हैं। यह प्रशासनिक सक्रियता का संकेत तो है, परंतु अंतिम निर्णय न्यायालय के अधीन ही होगा।
कानून का तकाजा है कि हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिले और हर पीड़ित को न्याय की उम्मीद।
पीड़ित परिवार का यह कहना कि उन्हें अब भी खतरा महसूस होता है, समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या गवाह और पीड़ित वास्तव में सुरक्षित हैं? यदि न्याय की प्रक्रिया भयमुक्त नहीं होगी, तो सत्य सामने आना कठिन होगा।
राज्य और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि पुनर्विवेचना के दौरान पीड़ित परिवार और संभावित गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
अक्सर कहा जाता है कि “जस्टिस डिलेयद इज जस्टिस देनीड ” — परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि न्याय का अवसर मिलना, भले देर से हो, न्याय प्रणाली में विश्वास को पुनर्जीवित करता है। 21 साल बाद यह मामला फिर चर्चा में है तो इसका अर्थ है कि न्याय व्यवस्था अब भी खुली है, अंतिम नहीं।
यह पुनर्विवेचना केवल एक परिवार की लड़ाई नहीं, बल्कि यह संदेश है कि अपराध कितना भी पुराना क्यों न हो, यदि सच्चाई दबाई गई है तो उसे सामने लाने का प्रयास जारी रह सकता है।
अब निगाहें जांच एजेंसियों और न्यायालय पर हैं। क्या नए सिरे से जुटाए गए साक्ष्य न्याय की दिशा तय करेंगे? क्या पीड़ित परिवार की उम्मीद पूरी होगी?
समाज, प्रशासन और न्यायपालिका तीनों की संयुक्त जिम्मेदारी है कि यह मामला निष्पक्षता, पारदर्शिता और विधि सम्मत प्रक्रिया के साथ आगे बढ़े।
21 वर्ष पुराने इस दोहरे हत्याकांड की पुनर्विवेचना केवल एक कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि न्याय के प्रति हमारे सामूहिक विश्वास की परीक्षा है।
21 साल बाद फिर खुला दोहरे हत्याकांड का पन्ना: क्या अब मिलेगा न्याय?


