पश्चिम एशिया एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां एक चिंगारी व्यापक युद्ध में बदल सकती है। मध्य तेहरान में हुए धमाकों और इजरायल द्वारा इसे “पूर्व-एहतियाती कार्रवाई” बताए जाने के बाद क्षेत्रीय तनाव ने खतरनाक रूप ले लिया है। हालांकि नुकसान और हताहतों की आधिकारिक पुष्टि अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की धड़कन तेज कर दी है।
यह हमला केवल दो देशों के बीच सैन्य कार्रवाई भर नहीं है; यह उस लंबे अविश्वास, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैचारिक टकराव की कड़ी है, जो वर्षों से इजरायल और ईरान के बीच simmer करता रहा है। सीरिया, लेबनान, गाजा और खाड़ी क्षेत्र में प्रभाव विस्तार की होड़ पहले ही संतुलन को नाजुक बना चुकी थी। ऐसे में सीधे तेहरान को निशाना बनाना एक साहसिक और जोखिमपूर्ण कदम माना जाएगा।
इजरायल ने इसे सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक कदम बताया है। उसका तर्क है कि संभावित खतरे को पहले ही निष्प्रभावी करना उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। दूसरी ओर, ईरान इस कार्रवाई को अपनी संप्रभुता पर सीधा हमला मान सकता है। यदि जवाबी कार्रवाई होती है, तो संघर्ष सीमित दायरे से निकलकर व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।
चिंता की बात यह है कि पश्चिम एशिया पहले ही कई मोर्चों पर अस्थिर है। गाजा संघर्ष, लेबनान सीमा पर तनाव, यमन में अस्थिरता और खाड़ी देशों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा—इन सबके बीच तेहरान में धमाके एक नई परत जोड़ते हैं। ऐसे हालात में किसी भी पक्ष की आक्रामक प्रतिक्रिया पूरे क्षेत्र को आग में झोंक सकती है।
इस घटनाक्रम का वैश्विक असर भी कम नहीं होगा। तेल बाजारों में उथल-पुथल की आशंका है, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर दबाव बढ़ सकता है और वैश्विक कूटनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। अमेरिका, रूस और यूरोपीय देशों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। यदि कूटनीति सक्रिय नहीं हुई तो सैन्य गठबंधनों की सक्रियता बढ़ सकती है।
यह भी विचारणीय है कि “पूर्व-एहतियाती कार्रवाई” की अवधारणा अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के संदर्भ में कितना स्वीकार्य है। संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मंचों पर इस पर बहस तेज होना तय है। यदि इस तरह की कार्रवाइयों को सामान्य रणनीति का हिस्सा माना जाने लगे, तो विश्व व्यवस्था में अस्थिरता बढ़ेगी।
ऐसे समय में संयम ही सबसे बड़ी शक्ति है। युद्ध का परिणाम किसी एक पक्ष की जीत नहीं, बल्कि मानवीय और आर्थिक क्षति होता है। इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष वर्षों तक असर छोड़ते हैं और उनका समाधान अंततः बातचीत की मेज पर ही निकलता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अब चुनौती है—क्या वह इस संकट को बढ़ने से रोक पाएगा? क्या कूटनीतिक प्रयास सैन्य प्रतिक्रिया से पहले सक्रिय होंगे? और क्या दोनों पक्ष अपने रणनीतिक हितों के बीच संतुलन साध पाएंगे?
तेहरान में गूंजे धमाके केवल इमारतों को नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता को भी झकझोर रहे हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह घटना सीमित तनाव बनी रहेगी या एक बड़े संघर्ष की प्रस्तावना साबित होगी। दुनिया की निगाहें अब प्रतिक्रिया से अधिक संयम पर टिकी हैं।

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