चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping द्वारा सेना में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ छेड़ी गई व्यापक मुहिम ने देश की सैन्य व्यवस्था में गहरे बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस अभियान के तहत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है, लेकिन इसके साथ ही यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या इस सफाई अभियान से चीन की युद्ध क्षमता और कमांड संरचना पर अल्पकालिक असर पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना दीर्घकालिक सुधार की दिशा में अहम कदम है, परंतु वर्तमान में इससे सैन्य नेतृत्व में खालीपन और अस्थिरता की स्थिति बन सकती है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार लंदन स्थित थिंक टैंक International Institute for Strategic Studies (IISS) ने अपनी वार्षिक “मिलिट्री बैलेंस” रिपोर्ट में कहा है कि जब तक सेना के शीर्ष स्तर पर खाली पदों को नहीं भरा जाता, तब तक पीएलए कमजोर नेतृत्व ढांचे के साथ काम करती रहेगी। रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यह स्थिति सेना की तत्काल युद्धक क्षमता को प्रभावित कर सकती है, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्रीय तनाव बढ़ रहा हो।
भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम का असर चीन के सर्वोच्च सैन्य निकाय Central Military Commission तक पहुंचा है। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि हाल में दो शीर्ष जनरलों के खिलाफ जांच और कार्रवाई के बाद नेतृत्व का दायरा सीमित हो गया है। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया पर दबाव बढ़ सकता है और कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम में अस्थायी कमजोरी आ सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि नियुक्तियां पारदर्शी प्रक्रिया के बजाय व्यक्तिगत संपर्कों के आधार पर हुई हों, तो इस तरह की कार्रवाई से अल्पकाल में संचालन क्षमता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि दीर्घकाल में यह अभियान सेना के पेशेवर मानकों को मजबूत कर सकता है। यदि हथियारों की खरीद, अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों और रक्षा अकादमियों में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है, तो इससे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को बल मिल सकता है। शी जिनपिंग पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि सेना को “विश्व स्तरीय” बनाने के लिए अनुशासन और निष्ठा अनिवार्य है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती सैन्य सक्रियता के बीच यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है। विशेष रूप से ताइवान के आसपास चीनी सैन्य गतिविधियों में वृद्धि ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। IISS की रिपोर्ट के अनुसार, एशिया में कुल रक्षा खर्च में चीन की हिस्सेदारी लगभग 44 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो उसकी सैन्य महत्वाकांक्षाओं को दर्शाती है। ऐसे में कमांड संरचना में किसी भी प्रकार की कमी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान स्थिति लंबी अवधि तक बनी रहती है, तो संभावित संघर्ष की स्थिति में त्वरित और समन्वित प्रतिक्रिया देने में कठिनाई आ सकती है। हालांकि रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि किसी तत्काल युद्ध की स्थिति में चीन कमजोर होगा, लेकिन यह जरूर रेखांकित किया गया है कि नेतृत्व में अस्थिरता रणनीतिक योजना और क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती है।
चीनी रक्षा मंत्रालय ने इस अध्ययन पर तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं, बीते दिनों सेना को संबोधित करते हुए शी जिनपिंग ने कहा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में “असाधारण प्रगति” हुई है और सेना अधिक अनुशासित और जवाबदेह बनी है। उनका दावा है कि यह अभियान सेना को आंतरिक रूप से मजबूत करेगा।
कुल मिलाकर, चीन की सेना इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है—एक ओर वह वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक सुधार की प्रक्रिया से गुजर रही है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कठोर रुख पीएलए को दीर्घकाल में अधिक सक्षम बनाता है या अल्पकालिक अस्थिरता उसकी रणनीतिक क्षमता पर भारी पड़ती है।


