गड्ढे जस के तस, ओवरलोडिंग बेखौफ निशाने पर सिर्फ आम आदमी क्यों?
शाहजहाँपुर: हरदोई बाईपास (Hardoi Bypass) पर लागू रूट डायवर्सन अब यातायात (transportation) सुधार से अधिक राजस्व संग्रह अभियान बनता नजर आ रहा है। चौराहे पर तैनात ट्रैफिक कर्मियों की सक्रियता व्यवस्था संभालने से ज्यादा चालान काटने में दिखाई दे रही है। हरदोई बाईपास से रिलायंस गेट तक का इलाका इन दिनों दोपहिया चालकों और ई-रिक्शा संचालकों के लिए किसी चालान चक्रव्यूह से कम नहीं। ग्रामीण क्षेत्रों से शहर आने वाले मेहनतकश लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
आरोप है कि हेलमेट पहनने के बावजूद छोटी-छोटी तकनीकी खामियों के नाम पर चालान थमा दिए जा रहे हैं। महंगाई की मार से जूझते परिवारों के लिए यह आर्थिक आघात किसी सजा से कम नहीं। त्योहारों की दस्तक के बीच रोजी-रोटी की चिंता अलग, ऊपर से चालान की मार आम आदमी की जेब और मन दोनों पर बोझ बढ़ रहा है। विडंबना यह है कि जिन सड़कों पर नियमों का डंडा चल रहा है, वही सड़कें खुद बदहाली की गवाही दे रही हैं।
हरदोई बाईपास से रिलायंस गेट तक जगह-जगह गड्ढे मुंह बाए खड़े हैं। वाहन चालक बचते-बचाते निकलते हैं, पर गड्ढों की मरम्मत पर कोई तत्परता नहीं दिखती। सवाल उठता है क्या व्यवस्था सुधार केवल चालान से ही संभव है?शहर की सड़कों पर ओवरलोडिंग वाहन खुलेआम फर्राटा भर रहे हैं। नो-एंट्री में घुसकर जाम लगाने वालों पर कार्रवाई कम नजर आती है। नियमों का शिकंजा यदि है तो वह केवल बाइक और रिक्शा चालकों पर ही क्यों? क्या कानून का तराजू अलग-अलग वजन से तौला जा रहा है? इतना ही नहीं, कई सरकारी और प्रभावशाली वाहनों पर प्रदूषण प्रमाणपत्र, बीमा या हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट का अभाव भी चर्चा में रहता है, पर उन पर कार्रवाई विरले ही दिखती है।
नियमों की विश्वसनीयता तभी कायम रहती है जब उनका पालन बिना भेदभाव के हो। यातायात अनुशासन आवश्यक है, परंतु अनुशासन का अर्थ केवल दंड नहीं, सुधार भी है। यदि सड़कें दुरुस्त हों, संकेतक स्पष्ट हों और नियमों का पालन सब पर समान रूप से लागू हो, तभी व्यवस्था पर विश्वास कायम होगा। अन्यथा जनता के मन में यह धारणा गहराती जाएगी कि बाईपास पर रूट डायवर्सन नहीं, राजस्व डायवर्सन चल रहा है।


