कानपुर
पुरुषों की तुलना में महिलाओं में हृदय रोगों की स्थिति अधिक गंभीर पाई जा रही है। इसका बड़ा कारण यह है कि महिलाओं में हार्ट अटैक के लक्षण अक्सर चुपचाप आते हैं और दर्द बहुत हल्का या बिल्कुल नहीं होता। ऐसे में महिलाएं शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं और अस्पताल पहुंचने में देर हो जाती है, जिससे बीमारी जानलेवा रूप ले लेती है।
यह खुलासा कार्डियोलॉजी विभाग में ठंड के मौसम के दौरान किए गए एक अध्ययन में हुआ है। अध्ययन में 426 महिलाओं और 426 पुरुषों को शामिल किया गया। शोध के अनुसार हार्ट अटैक से पीड़ित महिलाओं में नसों की स्थिति पुरुषों की तुलना में अधिक खराब पाई गई।
अध्ययन करने वाले कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अवधेश शर्मा ने बताया कि महिलाओं की कोरोनरी आर्टरी पुरुषों के मुकाबले छोटी होती हैं। जब इनमें थक्का जमता है तो तेज दर्द नहीं होता या दर्द महसूस ही नहीं होता। महिलाएं सीने के हल्के दर्द को सहन कर लेती हैं, जबकि पुरुषों में नसें बड़ी होने के कारण थक्का जमते ही तेज दर्द होता है और वे तुरंत इलाज के लिए पहुंच जाते हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि हार्ट अटैक से पीड़ित कई महिलाओं की नसें कई जगह से बंद या पूरी तरह ब्लॉक थीं, जो बीमारी की गंभीरता को दर्शाता है। वहीं उम्र के लिहाज से देखा जाए तो 35 वर्ष या उससे कम उम्र की किसी महिला में हार्ट अटैक का मामला सामने नहीं आया, जबकि पुरुषों में यह जोखिम 30 वर्ष की उम्र से ही दिखने लगा।
डॉ. शर्मा के अनुसार महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन मीनोपॉज तक हृदय रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है। लेकिन मीनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन कम और प्रोजेस्ट्रॉन बढ़ने से हार्मोनल असंतुलन होता है, जिससे दिल की बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों ने महिलाओं को सलाह दी है कि सीने में हल्का दर्द भी महसूस हो तो उसे नजरअंदाज न करें। अगर इसके साथ थकान, सांस फूलना, चक्कर आना या मिचली जैसे लक्षण हों, तो तुरंत हृदय जांच करानी चाहिए। मीनोपॉज के बाद महिलाओं को नियमित रूप से ईसीजी, टीएमटी और लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच कराते रहना चाहिए और तनाव से बचना चाहिए।


